दोस्तों मौत दो तरह की होती है,एक जिस्म की और दूसरी कला की.जिस्म की मौत के बाद भी इन्सान अपनी कला के ज़रिये हमेशा जी सकता है लेकिन कला की मौत के बाद वो सिर्फ सांस लेता हुआ मामूली इन्सान की तरह जीता रह जाता है.
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में हम बात करेंगे कुछ ऐसे निर्देशकों की जिनका शरीर तो जिंदा है लेकिन उनकी कला पता नहीं कहाँ खो गई है,वो ज़िंदा भी है या नहीं इसकी भी अब तक कोई ख़बर नहीं.इस चर्चा में पहला नाम है मशहूर लेखक-निर्देशक गुलज़ार के सहायक रह चुके चंद्रशेखर नार्वेकर उर्फ़ 'एन.चन्द्रा' का जिन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति का ऐलान किया था 1986 में फिल्म 'अंकुश' के द्वारा जिसमे उन्होंने लेखक,संपादक और सह-निर्माता की तिहरी भूमिका निभाई थी.
