Wednesday, February 12, 2014

# Anniversary Post

दोस्तों इस फ़रवरी इस ब्लॉग ने अपने वजूद के पूरे सात साल मुक़म्मल कर लिए हैं । जी हाँ, कॉमिक वर्ल्ड को वजूद में आये इस चार फ़रवरी को पूरे सात साल का अरसा हो चुका है । जैसा कि दस्तूर हैं कि हर सालगिरह पोस्ट में पिछले सालों की, उपलब्धियां तो नहीं कह सकते हैं बल्कि ब्लॉग के चलन की विवेचना ज़रूर की जाती है । यह ब्लॉग, जोकि शुरू हुआ था इस वाहिद मक़सद के साथ कि इंद्रजाल कॉमिक्स पर ख्याल, यादें और अनुभव साथी इंद्रजाल कॉमिक्स प्रेमियों के साथ साझा किये जाये, वह समय के साथ-साथ कॉमिक्स पर ही न सीमित रहकर उपन्यासों, बाल पॉकेट बुक्स, फ़िल्मों इत्यादि को भी अपने घेरे में लेने लगा जिसे आप लोगों ने पसंद भी किया क्योंकि आरंभिक कॉमिक्स स्कैन करने और शेयर करने की प्रक्रिया के अलावा इस ब्लॉग ने कॉमिक्स और उनकी कहानियों पर भी तब्सिरा करना आरंभ किया जिसमे ख़ासतौर से इंद्रजाल कॉमिक्स की कहानियों पर विवेचना पसंद की गई ।
चुनिंदा फ़िल्मों की दृश्य-दर-दर विवेचना भी एक नया प्रयोग थे जिसे भी आपने सराहा मसलन 'शक्ति' फ़िल्म पर पोस्ट जिसमे फ़िल्म की ख़ासियतों का वर्णन उनसे सम्बंधित दृश्यों के साथ किया गया था । 

बहरहाल इस पोस्ट का मक़सद जिस चीज़ पर चर्चा करना है वह मेरे दोनों शौकों-यानि कॉमिक्स और फ़िल्म-का हाइब्रिड है जोकि है ऐसी कॉमिक जिसे आजकल ग्राफ़िक नॉवेल के नाम से ज्य़ादा जाना जाता है । 'शोले' फ़िल्म हाल ही में थ्री-डी फॉर्मेट में भी प्रदर्शन के कारण चर्चा में थी और अब इस फ़िल्म पर सिप्पी बंधुओं द्वारा दो कॉमिक्स, जिन्हे ग्राफ़िक नॉवेल कहा जाता है, निकाली गयी हैं । पहली कॉमिक हैं जिसमे फ़िल्म शोले की कहानी एक कॉमिक के रूप में पेश कि गई है । 



   



















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Saturday, January 11, 2014

Sholay: The Unknown Facts

शताब्दी की फ़िल्म घोषित की गयी फ़िल्म 'शोले' एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि इस जनवरी इसे थ्री-डी फॉर्मेट में रिलीज़ किया गया है । वैसे तो इस फ़िल्म के मुताल्लिक इतना लिखा जा चुका है कि शायद ही इस फ़िल्म का कोई ऐसा पहलु बाकी हो जिसपर तब्सिरा या चर्चा न की जा चुकी हो या जो इस फ़िल्म के कट्टर शैदाईयों की नज़रो से छुपा हो । 






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Monday, June 24, 2013

# The Sound Of Music

दोस्तों कहते हैं कि संगीत में भी एक नशा होता है जो सुनने वाले को बेसुध कर देता है । कहा तो इतना तक गया है कि कई-कई संगीतकार तो अपने संगीत से सम्मोहित कर लोगों को वश में कर लेते थे । 

'Pied Piper Of Hemlin' की कथा तो आप सबने पढ़ी/सुनी ही होगी जिसमे Hemlin शहर के निवासी अपने शहर के लातादाद(असंख्य) चूहों से छुटकारा पाने के लिए एक दक्ष बांसुरी वादक को बुलाते हैं जो अपनी बांसुरी की मीठी और मोहक तान पर चूहों को सम्मोहित कर उन्हें शहर से बाहर एक नदी में ले जाकर डुबो कर नगरवासियों को उनसे निजात दिलाता है ।






















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Sunday, June 16, 2013

"आखरी मुग़ल "






दोस्तों , कॉमिक वर्ल्ड पर आज हम भारतीय इतिहास के पन्ने पलटते हुए चलते हैं और मिलते हैं  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले युद्ध "1 8 5 7 के विद्रोह " के वयुवृद्ध सेनानायक , सच्चे देशभक्त , अपने बे पनाह दर्द ए दिल का इजहार  अपनी कलम के माध्यम से व्यक्त करने वाले मशहूर उर्दू  कवि  , उर्दू  गजल सम्राट ,चित्र भारती कथामाला के दुर्लभ अंक #3 के नायक 'आखरी मुग़ल सम्राट मिर्ज़ा अबू  ज़फर सिराजुद्दीन मोहम्मद  उर्फ़




                                           "बहादुर शाह ज़फर "
 

"ना किसी की आंख का नूर हूँ , न किसी के दिल का करार हूँ , जो किसी के काम ना आ सके , मैं वो एक मुश्त -ए -गुबार हूँ "
 



आखिर क्या वजह थी इनके लिखे प्रत्येक शब्द में लिपटे दर्द और पीड़ा की ? चलिए जानने की कोशिश करते हैं :-


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Saturday, June 1, 2013

# Fabulous Filmfare

दोस्तों,अगर आज़ाद हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी रिसालों(पत्रिकाओं) की बात की जाये तो ज़ेहन में बिलाशुबह 'फ़िल्मफ़ेयर' का नाम सबसे पहले उभरता है । हिंदुस्तान,जहाँ फ़िल्में और क्रिकेट को किसी धर्म से कम नहीं माना जाता वहाँ आम जनमानस तक फ़िल्में और फ़िल्मी सितारों की खबरें पहुँचाने में इन फ़िल्मी रिसालों का बहुत बड़ा हाथ है और आज हम बात करेंगे ऐसी ही एक फ़िल्मी पत्रिका के बारे में जो सन 1952 से लेकर आज तक किसी सितारे की तरह जगमगा रही है । 

सन 1838 में आरम्भ हुए टाइम्स ग्रुप ने आज़ादी के बाद महसूस किया कि फ़िल्में एक सशक्त लोकप्रिय माध्यम बनकर उभरी हैं और इस क्षेत्र में एक 'यूजर फ्रेंडली' पत्रिका की कमी है क्योंकि उस दौर में लोकप्रियता की चोटी पर बाबुराव पटेल की 'फिल्म इंडिया' थी जो मुख्यतया: फ़िल्मी समीक्षाओं पर अपने तेज़ाबी आलेखों और अदाकारों की कटु आलोचना के लिए जानी जाती थी । 
चूँकि फ़िल्म इंडिया अपने लेखों और समीक्षाओं में सितारों की टांग खींचने में कोई कसर नहीं रखा करती थी अत: यह सितारों की गुड बुक में कभी नहीं रही जिसके चलते टाइम्स ग्रुप ने ऐसा महसूस किया कि सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता के फलस्वरूप हिंदुस्तानी सिने-प्रेमी सितारों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानने के इच्छुक हैं इसलिए उन्होंने एक ऐसी फ़िल्मी पत्रिका की परिकल्पना की जिसके सितारों के साथ मधुर सम्बन्ध हों और जो इनके फ़िल्मी और निजी जीवन के क्रियाकलापों के बारे में और करीब से जानने की एक आम सिने-दर्शक की क्षुधा को शांत कर सके । लिहाज़ा 'फ़िल्मफ़ेयर' वजूद में आई और अंग्रेज़ी भाषा एवं आठ आने क़ीमत वाला इसका प्रथम अंक 7 मार्च 1952 की मोहर लिए बाज़ार में आया जिसके कवर पर कामिनी कौशल की तस्वीर थी । 





        






















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Tuesday, April 30, 2013

# Gold Key:Vol.2

The second awaited volume of Hermes Press consisting of the remaining Nine comic books published by Western Publishing during 1962-66 under the banner Gold key is out now which thus conclude the restoration of the 17 classic Lee Falk's Phantom stories which were redrawn by Bill Lignante and written by Bill Harris and Lignante himself.



     






















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Sunday, March 10, 2013

# अंक 339 -"विद्रोही दानव" - "हज्ज की प्रेम कहानी"



सर्वप्रथम तो आप सभी पाठकों को कॉमिक वर्ल्ड की तरफ से 'महाशिवरात्रि' पर्व की बहुत बहुत बधाई ! और इस महापर्व को मनाने कॉमिक वर्ल्ड पर पधारें हैं दो महानायक ! एक तो है महाबली वेताल और दूसरा है जो  चट्टानों को चूर चूर कर दे , स्वाभाव से बिलकुल शांत, पर अगर बिगड़ जाये तो प्रलय ला दे , तब इसे इसके सिवा कोई दूसरा नहीं रोक सकता ! क्या आप  अब भी नहीं समझे  की यह कौन है  ? अरे भाई ऐसा सीधा साधा मगर ब्रहमास्त्र से भी ज्यादा विनाशक इसके सिवा दूसरा कोई और हो ही नहीं सकता ! अब तो इसका नाम ही कानों में घन्टों के माफिक बजने लगा है
                                                              हज्ज हज्ज हज्ज
वेताल की जिस भी कहानी में  हज्ज आया , मानो जलजला ही आ गया ! मैं तो जब भी हज्ज की कहानी पढ़ता हूँ तो मुझे यह कभी भी महसूस ही नहीं हुआ की मैं कोई वेताल कथा पढ़ रहा हूँ क्योंकि हज्ज की हर कहानी में वेताल की भूमिका एक 'सहायक' की भूमिका से ज्यादा नहीं होती ! शुरू से लेकर अंत तक बस हज्ज ही हज्ज ! हर कहानी में वेताल की शख्सियत हज्ज की पहाड़नुमा शख्सियत से टकराकर हज्ज के साए के आस पास ही सिमट कर रह जाती है So  Ladies & Gentlemen,once again Eighth Wonder of the World, 

                                                               Hzz
                                                              Is Back
                                                              In & As

   Beast Unleashed in a dynamic, thrilling & explosive Love Story

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Wednesday, March 6, 2013

# Amitabh's Coolie Accident


दोस्तों,आज मैं आपसे उस घटना की चर्चा करने जा रहा हूँ जो कई वर्षों से मेरे ज़ेहन में खदबदा रही थी और जिसके पीछे की सच्चाई मैं हमेशा से ही जानने का इच्छुक रहा था । ....और वह घटना है तक़रीबन आज से तीस साल पहले 24 जुलाई 1982 के दिन फ़िल्म 'कुली' के सेट पर घटित हुई अमिताभ के साथ दुर्घटना जिसने अमिताभ को मौत के मुंह में पहुंचा दिया था जहाँ से उनका वापस आना किसी चमत्कार से कम नहीं था ।

फ़िल्म 'कुली' एक उस दृश्य की शूटिंग चल रही थी जिसमे गोगा कपूर एवं पुनीत इस्सर कुलियों का चिट फंड का पैसा समेट कर भाग रहे हैं और नीलू फुले दूसरे कुलियों के साथ आकर उन्हें रोकता है । लड़ाई शुरू हो जाती है और जब पुनीत इस्सर नीलू फुले का दूसरा हाथ भी काट देने को तत्पर होता है तभी अमिताभ की एंट्री होती है एवं अमिताभ और पुनीत के बीच वन टू वन फाइट शुरू हो जाती है । अमिताभ पुनीत को 4-5 मुक्के जड़ते हैं उसके बाद पुनीत अमिताभ को पकड़कर खंबे से टिकाकर उनके पेट में बायीं तरफ़ एक मुक्का जड़ता है और उन्हें खींच कर फिर मुंह पर एक मुक्का जड़ता है जिसके बाद अमिताभ पास पड़ी एक मेज़ पर कलाबाज़ी खाकर फ़र्श पर गिर जाते है ।
























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Monday, February 11, 2013

अंक #292 - बहादुर और चुड़ैल की चुनौती





(Friends this post is authored by Vishal bhai for which lots and lots of thanks to him) 


























हिंदी इंद्रजाल कॉमिक्स  के चाहने वालों को मेरा यानि की 'विशाल' का सलाम ! दोस्तों इस बार मैं ले कर आया हूँ बहादुर की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान , इंद्रजाल का अंक # 292  (The Challenge of Witch) यानि की


      "बहादुर और चुड़ैल की चुनौती"

चेतावनी : कमजोर दिल वाले इस पोस्ट को मत पड़ें और रात के वक्त तो हर्गिज  नहीं !!



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Monday, February 4, 2013

# 6th Anniversary Post

Friends today is 6th anniversary of the this blog which was created in 2007 to cherish and revive the love for comics and specially Indrajal comics which later on diverted towards multiple fields such as writing about movies,reviewing novels/films and discussion over magazines and comics in general.
I was thinking of to post something befitting to the occasion but it couldn't happened due to some unavoidable adverse and compelling conditions because of which i am away from my work place and away from net also due to which at the moment i am unable to post something of the likes of which was being expected from comic world.
Hence for the sake of continuation the tradition of anniversary post this time i am able to post a comic only which is contributed by Vishal bhai for which tons of thanks to him,and also i promise to post something big and befitting once i am at peace and in situation to do so.
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Monday, January 7, 2013

# Mohammad Rafi

31 जुलाई 1980 के दोपहर के करीब 12 बजे का समय रहा होगा जब मशहूर और मारूफ़ गुलुकार मो रफ़ी अपने घर पर आराम कर रहे थे तभी उन्हें पेट और सीने में भारीपन सा महसूस हुआ जो उन्हें बदहज़मी की वजह से होता लगा और जिसके चलते उन्होंने घरेलु नौकर से सोडा मिंट की गोली मंगवा कर खा ली जिसके कुछ देर बाद उन्हें आराम महसूस हुआ और वे आराम करने लगे । 
लेकिन 4 बजे के आसपास उन्हें फिर दर्द महसूस हुआ और इस बार शिद्दत के साथ,उन्होंने फ़ौरन घर में मौजूद अपनी बीवी को बुलाया जो उनकी उखड़ती साँसे और नीले पड़ते होंठों को देख घबरा गयी । फ़ौरन नज़दीकी डॉक्टर को बुलवाया गया जिसने उनकी जांच करने के बाद उन्हें नेशनल हॉस्पिटल ले जाने की सलाह दी और रफ़ी साहब को उनकी कार में नेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया ।  

नेशनल हॉस्पिटल की लिफ्ट ख़राब थी और ईसीजी रूम ऊपर था लिहाज़ा रफ़ी साहब खुद सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गए जहाँ लम्बी जांच के बाद पता चला कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा है और उन्हें फ़ौरन मुंबई हॉस्पिटल ले जाने की सलाह दी गयी क्योंकि नेशनल हॉस्पिटल में दिल के दौरे के इलाज की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी । लिहाज़ा मुंबई हॉस्पिटल के इंचार्ज से बात कर रफ़ी साहब शाम के 7 तक बजे वहाँ पहुँचे जहाँ उनका मुक़म्मल इलाज शुरू हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि दौरा पड़ने के बाद से बेहद कीमती समय हॉस्पिटल के चक्कर काटने में जाया हो चुका था । बीच में रफ़ी साहब की तबियत कुछ संभली और उन्होंने अपने साथ मौजूद घर वालों से बात भी की लेकिन फिर जो तबियत बिगड़ी तो सम्भली नहीं और यह अज़ीमतरीन फ़नकार रात 10 बजकर 25 मिनट पर अपने करोड़ों चाहने वालों को छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से चला गया । 




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Thursday, December 6, 2012

# Andha Yuddh

दोस्तों,फ़र्ज़ कीजिये एक ऐसी कहानी का जिसमे एक आतंकवादी किसी राज्य के मुख्यमंत्री का क़त्ल कर एक घर में घुस जाता है जिसमे अपनी माज़ूर और दूसरों पर बोझ बन चुकी ज़िन्दगी से निराश मौत की कामना करती पैरो से अपाहिज एक लड़की मौजूद होती है । आतंकवादी उस बेबस और ज़िन्दगी से मायूस लड़की को बंधक बना लेता है । पुलिस मकान को चारों तरफ़ से घेरे खड़ी है ।  आतंकवादी के बच निकलने के एकलौता सहारा वह अपाहिज लड़की है जो पहले से ही अपने ज़िन्दगी से बेज़ार है और दिन-रात मौत की कामना करती रहती है ।  आतंकवादी लड़की की जान लेने की धमकी देकर पुलिस को धमकाए रखता है और एक जाँबाज़ और कर्मठ इंस्पेक्टर सीमित संसाधनों के बावजूद उस खूँखार आतंकवादी को पकड़ने की तमाम जुगतें लगाता बैठता है । अपनी ज़िन्दगी से परेशान विकलांग लड़की आतंकवादी से उसके मक़सद ,दहशतगर्दी और दूसरों की जान लेने के उसके कृत्यों की सार्थकता के बाबत पूछती है जिसके जवाबों से उस आतंकवादी की मनोस्थिति की कैफ़ियत से वाकफियत होती है ।  जितना अरसा वह आतंकवादी और लड़की साथ गुज़ारने पर मजबूर होते हैं उसमे एक दहशतगर्द की मानसिकता के कड़वे लेकिन रोचक पहलु उजागर होते हैं ।

दोस्तों,आज हम एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बात करेंगे जिसमे यह विषय बड़ी संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ हैंडल किया जाता है और इस फ़िल्म का नाम है 'अँधा युद्ध'





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Saturday, December 1, 2012

# Review of The Phantom:The Complete Sundays Vol.1

The long awaited publication from Hermes press 'The Phantom:The Complete Sundays:Volume One 1939-1942' has been released.This volume is first in the ambitious series of publication of all Sunday Strips in a magnanimous format by Hermes Press.
The Hermes Press publication has already been publishing Phantom Daily Strips in B/W format but in color this volume is first in its series.


  

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Friday, November 16, 2012

# Waqt

"मौत से भला किसकी रिश्तेदारी है,
आज हमारी तो कल तुम्हारी बारी है"

दोस्तों,इसी फ़लसफ़े को सच करते हुए इस साल फिल्मी दुनिया की कई मशहूर हस्तियाँ हमसे बिछड़ गयी जिनकी भौतिक उपस्थिति भले ही हमारे बीच में न हो लेकिन जिनका नाम अपने काम की वजह से हमेशा हम सब के दिलों में जिंदा रहेगा ।

ऐसी ही एक वट वृक्ष सरीखी हस्ती थी मशहूर निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा साहब(1932-2012) की जो अक्टूबर माह में हम सब से बिछड़ गए लेकिन जिनका नाम हिंदी फिल्मी दुनिया में हमेशा यश पाता रहेगा ।
इस सपनों के सौदागर सरीखे निर्देशक को जिसकी फ़िल्मों ने हमें मनोरंजन से परिपूर्ण अनगिनत लम्हे दिए हैं उसे आज हम उसकी एक फ़िल्म पर तब्सिरा कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे ।

यश चोपड़ा यानी यश राज चोपड़ा मशहूर निर्माता-निर्देशक बी.आर.चोपड़ा के छोटे भाई थे जिन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत आई एस जौहर के सह-निर्देशक के रूप में की जिसके बाद यह अपने बड़े भाई के साथ फ़िल्म प्रोडक्शन में जुड़ गए और जिन्होंने स्वतंत्र रूप से इन्हें अपनी फ़िल्म 'धूल का फूल' का निर्देशन सौंपा ।  'धूल का फूल' की क़ामयाबी के बाद इन्होने अपने भाई के बैनर के लिए 'धर्मपुत्र','वक़्त','आदमी और इंसान और 'इत्तेफ़ाक' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया जिनमे से 'वक़्त' और 'इत्तेफ़ाक' ने सफ़लता के झंडे गाड़े जबकि 'धर्मपुत्र' और 'आदमी और इन्सान' ने औसत सफ़लता प्राप्त की ।
आज की इस महफ़िल में हम बात करेंगे फ़िल्म 'वक़्त'(1965) के बाबत जिसकी चटख,चमक और रंग आज लगभग आधी सदी गुज़र जाने के बाद भी फीके नहीं पड़े हैं ।




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Saturday, November 10, 2012

# Shakti

शहर: बरेली,
ज़िला: उत्तर प्रदेश
22 सितम्बर सन 1982,सुबह के क़रीब 10 बजे
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शहर बरेली का सबसे बड़ा और सबसे भव्य थियेटर प्रभा टाकीज़ जो रामपुर गार्डन नामक पॉश कॉलोनी के नज़दीक स्थित है । आज इस टाकीज़ में पैर रखने तक को जगह नहीं है और हर तरफ़ सर ही सर नज़र आ रहे हैं । हर तरफ़ भीड़ ही भीड़ ।  बुकिंग विंडो,जहाँ टिकटें बांटी जाती है कब की बंद हो चुकी है लेकिन अब भी विंडो को घेरे कई लोग इस उम्मीद में खड़े हैं कि शायद विंडो दोबारा फिर खुलेगी । विंडो के नज़दीक एक बड़ा सा बोर्ड लगा हुआ है जिसपर मोटे-मोटे अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिखा है 'हॉउसफुल' जिसे देख कर टिकट खरीदने आने वाले दर्शक निराशा में सर हिलाते हुए वापस लौट रहे हैं ।  जिनको टिकट मिल चुके हैं वे चहरे पर प्रसन्नता और विजेता के से भाव लिए दूसरो को हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए घूम रहे हैं और जिनको टिकट नहीं मिले हैं वे बेचैनी के आलम में टिकटों की जुगाड़ में हड़बड़ाये इधर-उधर घूम रहे हैं । 

एक कोने में एक ब्लैकिया टिकट बेच रहा है जिसे घेर कर भीड़ खड़ी है । ब्लैकिया बड़ी दक्षता से एक हाथ में टिकटों को दबाये और दुसरे हाथ में नोटों को उँगलियों के बीच दबाये 'पाँच का बीस,पाँच का बीस' कहता हुआ टिकट बेच रहा है । भीड़ उससे मोलभाव कर रही है लेकिन वह बड़े तजुर्बेकार और घिसे हुए अंदाज़ में अपनी मांग से टस से मस नहीं हो रहा है । 

ब्लैकिया और उसे घेरे खड़ी भीड़ से थोड़ी दूर टाकीज़ के एक गेट के नज़दीक एक छह-सात साल का बच्चा दीवार के सहारे खड़ी साईकल पर बैठा हुआ उत्सुकता और आशा भरी से नज़रों से बार-बार मुंह उठा कर भीड़ की तरफ देख रहा है । थोड़ी देर में भीड़ से निकल कर एक युवक साइकिल की तरफ़ आता है जिसे देख कर बच्चा उत्सुकता भरे अंदाज़ में कहता है,"क्या हुआ मुख़्तार भाई टिकट मिला क्या?" । युवक ना में सर हिलाता है । बच्चे का सर लटक जाता है । "चलो वापस चलते हैं",युवक कहता है । साइकिल पर बैठकर दोनों वापस लौट जाते हैं लेकिन उसी दिन के दुसरे शो के लिए करीब 1 बजे दोनों फिर वापस लौटते हैं । युवक टिकट विंडो पर किसी राशन की दुकान पर लगी सर्प सरीखी लम्बी लाइन में लग जाता है और बच्चा साईकल की रखवाली करता हुआ उसपर बैठा हुआ इस बार टिकट मिल जाने की आशा मन में लिए हुए इंतज़ार करता है । युवक एक बार फ़िर टिकट विंडो से टिकट प्राप्त करने की जीतोड़ कोशिश करता है लेकिन इस बार भी उसके हाथ निराशा ही लगती है और दोनों को फिर मुंह लटकाए घर वापस लौटना पड़ता है ।

दोस्तों,उस प्रभा थियेटर में-जिसका नाम प्रभा टाकीज़ था-फ़िल्म 'शक्ति' लगी थी और वह बच्चा और कोई नहीं बल्कि खुद खाकसार था और आज की इस बज़्मे महफ़िल में हम तब्सिरा करेंगे फ़िल्म 'शक्ति' पर । 







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Saturday, November 3, 2012

# गर्म हवा(Scorching Winds)

दोस्तों,इस ब्लॉग पर इतने तवील अरसे बाद हाज़िरी भरने के लिए आप सबसे मुआफ़ी की दरख्वास्त है । दरअसल हुआ यह था कि रुचियों के सामायिक परिवर्तनों के चलते ब्लॉग से तबियत उचटी और फेसबुक पर जा ठहरी जहाँ कुछ अरसे तक मशहूर लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के कद्रदानों के बीच रहा.......कुछ उनकी सुनी और कुछ अपनी कही | 

बहरहाल,एक बार फिर आप सबके बीच हाज़िर हूँ एक नयी पोस्ट लेकर जिसमे हम बात करेंगे एक ऐसी फ़िल्म की जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि वह तब थी जब बनी थी । यह एक ऐसी फिल्म है जो जितनी ईमानदारी से सवाल उठाती है उतने ही सशक्त ढंग से उनका जवाब भी देती है । यह एक ऐसी फिल्म है जो देखने वालों को झकझोर देती है और उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है । यह वह फिल्म है जो शायद आप में से ज़्यादा लोगों ने देखी न हो या शायद नाम भी न सुना हो और अगर ऐसा है तो यह वो फ़िल्म है जिसका नाम आपको मरने से पहले देखी जाने वाली फिल्मों की फ़ेहरिस्त में शामिल कर लेना चाहिए ।

दोस्तों,उस फ़िल्म का नाम है 'गर्म हवा' जो सन 1973 में प्रदर्शित हुई थी और जिसके मुख्य कलाकार थे 'बलराज साहनी,फारूख शेख़,गीता सिद्धार्थ,जलाल आग़ा,ए.के हंगल,युनुस परवेज़,जमाल हाशमी' इत्यादि ।        




























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Thursday, May 31, 2012

# Vintage Articles & Phantom Promo.

Update(2nd June2012):Another video of Phantom promo has been added.

Reading articles and watching images from old vintage film magazines specially of 70's and 80's time period sometimes do fascinate me more than comics.Few days back while flipping through some vintage magazines i came across with these articles which i thought of sharing with all of you.


























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Sunday, May 6, 2012

# शहरी सभ्यता का आलोचक वेताल


दोस्तों इस पोस्ट के मेहमान लेखक हैं दिनेश श्रीनेत जो मीडिया में एक जाना-माना नाम है।  
गोरखपुर में जन्मे दिनेश कथाकार और पेशे से पत्रकार हैं। आजकल दैनिक 'अमर उजाला' में बतौर वरिष्ठ प्रबंधक कार्यरत हैं। इंद्रजाल कॉमिक्स से दिनेश को बचपन से लगाव रहा है और इंद्रजाल कॉमिक्स में प्रकाशित चुनिन्दा कहानियों पर दिनेश गाहे-बगाहे हम सब के साथ तब्सिरा करते रहते हैं और ऐसे ही एक तब्सरे का मरकज़ बनने का शर्फ़ आज कॉमिक वर्ल्ड को हासिल हुआ है जिसके लिए कॉमिक वर्ल्ड के पाठकों की तरफ से दिनेश जी को बहुत-बहुत धन्यवाद।  
गाज़ियाबाद में कार्यरत दिनेश श्रीनेत फिल्म विधा पर आधारित एक ब्लॉग भी लिखते हैं जिसका नाम है इंडियन बॉयस्कोप। 





























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Sunday, February 12, 2012

# चौथा पुत्र

दोस्तों,महाबली वेताल के जन्म-मास उत्सव को मनाते हुए हम आज एक और लोमहर्षक वेताल कथा पर बात करेंगे जो अपने-आप में कई कारणों से विशिष्ट हैं । यह एक ऐसी कथा है जिसमे कई वेताल मानकों और स्थापित परम्पराओं को तोड़ा गया है और मज़े की बात यह है की इन मानकों को किसी और ने नहीं बल्कि खुद ली-फ़ाल्क ने तोड़ा है और मुझे भरपूर शुबहा है कि इन तथ्यों कि तरफ़ शायद ही पहले किसी का ध्यान गया हो । 

क्या हैं वो वेताल परम्पराएं और क्या हैं वो मानक इन पर हम आगे तो बात करेंगे ही लेकिन उससे पहले बात करते हैं इस कहानी की अन्य विशेषताओं पर ।  वेताल-पुरखों के कारनामों पर आधारित कथाएँ हमेशा से सामान्य से अधिक रोमांचक और दिलचस्प हुआ करती हैं और यदि कथा खुद फ़ाल्क द्वारा लिखित हो तो फिर क्या कहने ! 

ऐसी ही एक सन्डे कथा है S-137,'The Fourth Son' या 'चौथा पुत्र' जो अख़बारों में नज़र आई थी 18 अगस्त 91 से लेकर 17 मई 1992 तक यानि की इंद्रजाल कॉमिक्स के दु:खद अवसान(1990) के उपरांत जिसकी वजह से यह कहानी इंद्रजाल कॉमिक्स के पन्नो की शोभा तो न बन सकी लेकिन डायमंड कॉमिक्स के डाईजेस्ट न.61/62 में अवश्य ही इसने अपनी सतरंगी छटा बिखेरी ।
























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Tuesday, February 7, 2012

# Review of the Phantom:'The Gold Key Years:Volume 1'

Friends its the month of February and we have just celebrated the 5th anniversary of Comic World few days back.The indents at my finger tips caused by rigorous and continuous typing for the anniversary post haven't been fully recovered and i am back with another post within a span of 3 days driven by some special cause.


All of you must be well aware of that Phantom's very first strip 'The Singh Brotherhood' appeared in newspapers on 17th Feb. 1936,hence February could be termed as Phantom's month and Comic World would be celebrating this month by posting different-different features/comics relating to Phantom in general.


To start with here is the review of 'The Gold Key years:Volume 1' published by Hermes Press Publication.You must be knowing that Hermes Press is the publication which has recently brought out the 3 volumes of Phantom Daily strips and planning to publish all Gold key,King,Charlton and Sundays too.


The 'Gold Key' was the publishing banner of K.K.Publications of US which published 17 comic books of Phantom based on Lee Falk original strips(except issue no.11,12 and 13) illustrated by Bill Lignate and script by Bill Haris(from issue no.1-10) and Bill Lignate(issue no.11-17) within the period spanning from Nov.1962 to July 1966.


In this series Hermes Press has published the first 8 stories of Gold Key in its 1st Volume followed by a 2nd volume consisting of remaining nine stories out of a total 17 Gold Key stories.



























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