Friday, October 21, 2011

# पठनीय 'पाठक'

दोस्तों तकरीबन दो साल पहले की एक पोस्ट में मैंने लुगदी साहित्य के चर्चित उपन्यास एवं उपन्यासकारों जैसे की वेद प्रकाश शर्मा,गुलशन नंदा,ओम प्रकाश शर्मा,वेद प्रकाश कम्बोज,राजहंस,प्रेम बाजपाई इत्यादि का शदीद ज़िक्र किया था जिसमे आम हिंदी पाठक के बीच इन लुगदी साहित्य के उपन्यासों की लोकप्रियता और इन उपन्यासकारों के रुतबे पर भी चर्चा की गयी थी | 

उस वृहद पोस्ट में-जिसे आप सबकी काफ़ी सराहना भी प्राप्त हुई थी-लुगदी साहित्य के तक़रीबन तमाम लोकप्रिय उपन्यासकारों का नाम लिया गया था लेकिन एक बहुत बड़े उपन्यासकार-जिनके रुतबे से मैं उस समय तक वाकिफ़ नहीं था-का नाम छूट गया था जिसकी मुख्य वजह थी मेरी उन उपन्यासकार के उपन्यासों से नावकफियत क्योंकि तबसे पहले मैंने उनका एक भी उपन्यास नहीं पढ़ा था |

वो नामचीन उपन्यासकार हैं जनाब सुरेन्द्र मोहन पाठक(जन्म:19 फ़रवरी 1940) जो मौजूदा उपन्यासकारों में लोकप्रियता के पायदान की सबसे ऊँची सीढ़ी पर विराजमान हैं | 























पाठक जी चालीस से भी ऊपर सालों से मुतवातर लिखते चले आ रहे हैं और अपने खाते में तीन सौ के लगभग उपन्यास जमा कर चुके हैं जोकि अपने-आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है |

ऐसा नहीं है की मैंने इनके उपन्यास पढ़ने की कभी कोशिश नहीं की लेकिन किशोरावस्था और तरुणाई के उस दौर में जब मैंने नॉवल पढ़ना/समझना आरम्भ किये थे तब उम्र के तकाज़े के मुताबिक़ नाटकीय और कच्ची भावनाओं से परिपूर्ण उपन्यास ज़्यादा पसंद आते थे बनिस्बत धीर-गंभीर,ठहराव लिए हुए और वास्तविकता की मुंडेर पर लटकते हुए 'पाठक' सरीखे उपन्यासों के | 


इसी कारण मुझे वेद प्रकाश शर्मा,ओम प्रकाश शर्मा,इब्ने सफ़ी,वेद प्रकाश कम्बोज,गुलशन नंदा के कथानकों में ज़्यादा मज़ा आता था क्योंकि उनमे कच्ची भावनाओं की सरल उड़ान थी,नाटकीयता और फंतासी की चैरी थी,हालाँकि उस दौरान मैंने एक-दो बार पाठक जी के उपन्यासों को हाथ लगाया भी तो उनके प्रेक्टिकल,दुनियादारी,आभासी हकीक़त और गंभीरता से लबरेज़ कथानकों ने इतना बोर किया की मैं कभी भी तीन-चार पन्नों से आगे नहीं बढ़ पाया और तदुपरांत मैंने इनके उपन्यासों को पढ़ने की कोशिश करने की कोशिश करने से भी किनारा कर लिया | 

ऐसे ही समय बीतता गया और ज़िन्दगी तरुणाई के मनमोहक और स्वप्निल दौर से निकल कर युवावस्था के कठोर और मुश्किल धरातल पर आ गई,हकीक़त की चट्टान से जब शीशे जैसे नाज़ुक ख्वाब टकराए तो पता चला की इस दुनिया का चलन क्या है और मानसिकता में भी उसी के अनुरूप परिवर्तन हुआ| 

खैर,अब से कुछ महीने पहले जब ऑस्ट्रेलिया में निवास करने वाले एक अज़ीज़ दोस्त कुलदीप भाई का सुरेन्द्र मोहन पाठक के हालिया प्रकाशित उपन्यास 'चैम्बूर का दाता' की व्यवस्था करवाने हेतु इल्तिजा आई तो मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया की आखिर इस उपन्यास में ऐसी क्या ख़ास बात है जिसमे सात समंदर पार रह रहे living-encyclopdia के उपनाम से मशहूर दिग्गज,किताबों के रसिया कुलदीप भाई जैसे 'पुराने पापी' की दिलचस्पी मब्लूस हो सकती है  ! 





















आगे बात करने से पहले मैं ज़रा कुलदीप भाई के मुताल्लिक थोड़ी बात कर लूं क्योंकि मौजूदा पोस्ट का जन्म होने दे सकने में इनकी ठीक वही भूमिका है जो एक उत्प्रेरक की किसी भी महत्वपूर्ण रासायनिक क्रिया के होने देने में होती है | 

दोस्तों,चूँकि मेरी और कुलदीप भाई की कॉमिक्स,नॉवल,किताबों और फ़िल्मों के बाबत पसंद-नापसंद में एक हैरत-अंगेज़ समानता है तो आख़िरकार मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया की अगर कुलदीप भाई आज की अपनी इस परिपक्व आयु में सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यासों से इस क़द्र मुतास्सिर हैं की वो बावजूद इतनी दूरी के उनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए इतने लालायित हैं तो अवश्य ही पाठक जी के उपन्यासों में ऐसी कोई ख़ास बात है ज़रूर है जो की मेरी नज़र में आने से अब तक रह गयी है | 

अपने इस निष्कर्ष से प्रभावित होकर मैंने सुरेन्द्र मोहन पाठक के जो उपन्यास कुलदीप भाई के लिए जुटाए थे उन्हें पढ़ने की कोशिश करने की कोशिश शुरू की,उसी दौरान प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के ज़रिये मुझे यह भी पता चला की सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के दो उपन्यास अंग्रेजी भाषा में भी अनुदित कर प्रकाशित किये गए हैं जिनके हिंदी शीर्षक थे 'पैंसठ लाख की डकैती' और 'दिन दहाड़े डकैती' | शायद लुगदी साहित्य के सुरेन्द्र मोहन पाठक जी प्रथम एवं एकलौते ऐसे लेखक हैं जिनके उपन्यास फ़िरंगी भाषा यानी की अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित किये गए हैं |





















मैंने शुरुआत 'पैंसठ लाख की डकैती' से की जो पढ़ने के बाद मेरी उन उम्मीदों पर खरा न उतरा जो मैंने इस उपन्यास को पढ़ने से पहले इसके फिरंगी भाषा में भी प्रकाशित होने के कारण इससे लगा रखी थी लेकिन फिर भी उपन्यास मुझे कदरन बुरा न लगा | 

यह उपन्यास मुझे अच्छा क्यों नहीं लगा इसकी भी एक बहुत वाजिब वजह है जिसका ज़िक्र मैं आगे करूँगा ही | उसी दौरान एक दिन समय काटने के लिए मैंने पाठक जी का 'सुनील सीरीज़' का एक उपन्यास यूँही उठा कर पढ़ना शुरू किया और इस बार मुझे उपन्यास पसंद आया जिसके बाद मैंने अपने पास संगृहीत सुनील सीरीज़ की कई उपन्यास पढ़े जो मुझे दिलचस्प भी लगे और पाठक जी में भी मेरी दिलचस्पी कायम हो गई | 


सुनील सीरीज़ के उपन्यासों के बाद मैंने इनके कुछ थ्रिलर उपन्यास भी पढ़े जैसे की 'Dial 100'(जिस पर एक फ़िल्म भी बनी थी),'काँपता शहर' | जिसमे 'काँपता शहर'('मवाली' का परिवर्धित संस्करण) मुझे बहुत अच्छा लगा | बम्बईया भाषा का इतना सिद्धस्त इस्तेमाल और अंडर-वर्ल्ड का इतना सटीक एवं रोचक वर्णन मैंने आज तक नहीं पढ़ा | 



































































पाठक जी की असली 'पाठकीयत' से मेरी वाकफ़ियत अभी होना बाकी थी जो हुई 'जाना कहाँ'('जीना यहाँ' और 'मरना यहाँ' का सामूहिक संस्करण) के पढ़ने के बाद,जब मैंने सही मायनों में यह जाना की विमल सीरीज़ आखिर क्या बला है और तभी मुझे यह बात भी समझ में आई की उस समय मुझे 'पैंसठ लाख की डकैती' इसलिए अच्छा  नहीं लगा था क्योंकि तब मैं विमल की पृष्ठभूमि से परिचित नहीं था ! 






















बस,उसके बाद तो मैंने चुन-चुन कर विमल सिरीज़ के उपन्यास पढ़ना आरम्भ किये जिसका सिलसिला आज भी जारी है और अब जाकर कहीं यह बात मेरी समझ में आई है की क्यों सुरेन्द्र मोहन पाठक का रुतबा अभी तक कायम है,क्यों हिंदी लुगदी साहित्य-क्षेत्र में पाठक जी का नाम सबसे पहले लिया जाता है और क्यों सात समंदर पार बैठे कुलदीप भाई को 'पाठक' की ऐसी तलब थी ! 
























'बखिया पुराण' का अंतिम भाग 'खून के आंसू' पढ़कर तो मैं थर्रा गया और एक लम्बे अरसे बाद मैंने किसी उपन्यास को लेकर अपने जिस्म में वो रोमांच की वो लहर महसूस की जो कभी वेद प्रकाश शर्मा के 'तीन तिलंगे,सभी दीवाने दौलत के' सरीखे उपन्यास पढ़कर महसूस होती थी | 























यूँ तो सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने सबसे अधिक सुनील सीरीज़ के उपन्यास लिखे हैं लेकिन इसमें ज़रा से भी शक की कोई गुंजाईश नहीं है की उनकी सबसे मक़बूल सीरीज़ है महज़ चालीस से जायद लिखे गए सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल उर्फ़ विमल कुमार खन्ना उर्फ़ गिरीश माथुर उर्फ़ बनवारी लाल तांगेवाला उर्फ़ रमेश कुमार शर्मा उर्फ़ कैलाश मल्होत्रा उर्फ़ बसंत कुमार मोटर मकैनिक उर्फ़ नितिन मेहता उर्फ़ कालीचरण उर्फ़ पी.एन.घड़ीवाला उर्फ़ अरविन्द कॉल सीरीज़ के उपन्यास | 





















विमल सीरीज़ ऐसी शाहकार सीरीज़ है जिसने पाठक साहब को उन बुलंदियों पर पहुँचाया जहाँ हिंदी लुगदी साहित्य के क्षेत्र में पाठक जी वाहिद ऐसे उपन्यासकार होते हैं जिनके उपन्यास महंगे आयतित सफ़ेद चिकने कागज़ पर छपते हैं और जिन्हें आम मार्केट के हिसाब से कहीं ज़्यादा महंगे(Rs.80/-,100/-) होने के बावजूद भी अमूमन 'गरीब' समझे जाने वाले माध्यम-वर्गीय भारतीय हिंदी पाठक वर्ग में भी हाथों-हाथ बिक जाने का शर्फ़ हासिल है | 

























































'विमल सीरीज़' एक ऐसे चरित्र-जिसका नाम सुरेन्द्र सिंह सोहल है-के कड़ीवार कारनामों की दास्तान है जो हालात के हाथों मजबूर होकर जुर्म की दुनिया में धकेला गया था और अब उसी जुर्म और 'संगठित क्राईम' की दुनिया को-'लोहे को लोहा काटता है' वाली मसल पर चलकर-नेस्तनाबूत करने हेतु कटिबद्ध है |  








































चूँकि विमल की दुनिया के उपन्यासों के कोई नियम-कायदे नहीं हैं,कोई नैतिकता की जंजीरे नहीं हैं इसलिए इसके कथानकों में जुर्म की दुनिया के भीतर की गई आभासी हकीक़त की डोर से बंधी कल्पना की असीम उड़ाने पाठकों को वो 'किक' उपलब्ध कराती हैं जो सुनील सीरीज़ के नैतिकता के एक तयशुदा सीमित ढांचे में खड़े किये गए कथानकों से कही ज़्यादा आकर्षक,रुपहली और नशीली हैं |     























सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की ज़बरदस्त लेखन कला और हिंदी,उर्दू और पंजाबी भाषा की 'काकटेल' भी एक और वजह है सुबुद्ध और साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले पाठकों को इनसे जुड़ा रखने के पीछे |


पाठक जी एक और खूबी यह भी है की ये अपने उपन्यासों में अपने पाठकों से खूब सारे पन्नो में समहित दिल खोल कर बड़ी लम्बी-चौड़ी बाते करते हैं जिसमे अपने पिछले उपन्यास से सम्बंधित पाठकों की प्रतिक्रियाओं/पत्रों पर सुरेन्द्र जी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में अपनी आकर्षक भाषा शैली में जवाब देते हैं | किसी भी लेखक की अपने पाठकों से इस क़द्र चौड़े पैमाने पर अंतरंगता कम-अज़-कम मैंने तो आज तक नहीं देखी |















विमल,सुनील सीरीज के अलावा पाठक जी के दुसरे मकबूल चरित्र हैं 'सुधीर कोहली,जीत सिंह,विवेक अगाशे,मुकेश माथुर' लेकिन लोकप्रियता के पैमाने पर सभी विमल और सुनील के पासंग भी नहीं हैं | 













































इकहत्तर वर्षीय पाठक जी लेखकों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें कंप्यूटर पर गिट-पिट करने के बजाये कलम-दवात द्वारा लिखना ही भाता है | जहाँ दुसरे समकालीन लेखकों ने पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने हेतु ई.मेल,एस.एम्.एस,फ़ोन जैसे त्वरित साधनों को अपना लिया है वही दूसरी ओर पाठक जी आज भी खतो-किताबत के ज़रिये ही पाठकों से जुड़े हैं और सभी पत्रों का हस्तलिखित उत्तर देते हैं | 






















साल में औसतन 3-4 उपन्यास लिखने वाले बेहद मिलनसार और नर्म स्वभाव के पाठक जी सनसनी फ़ैलाने वाले उन तमाम मार्केटिंग हथकंडों से दूर रहते हैं जो उनके कुछ समकालीन लेखक समय-समय पर अपने नए आगामी उपन्यास के बाबत फ़ैलाते रहते हैं और अपनी ही मगन में मस्त पाठकों के एक के बाद एक मनोरंजक उपन्यास मुहैया कराते रहते हैं जो बकौल खुद उनके सिर्फ़ सिनेमा की तरह सस्ता मनोरंजन प्रदान करते हैं लेकिन बकौल उनके तमाम पाठकों के किसी भी उच्च कोटि के साहित्य से कमतर दर्जा नहीं रखते | 


जिस रफ़्तार और क्वालिटी के साथ पाठक जी लिख रहे हैं और लिखते आ रहे हैं उसे देख कर तो बस एक ही शेर पढ़ने का जी चाहता है की:


"अल्लाह करे ज़ोर-ऐ-क़लम और भी ज़ियादा"








     

30 comments:

pradeep singh said...

Most of the novel I found are copied from Erle stanely Gardner's Perry mason series court drama, was very disappointed with it.

Anonymous said...

long-awaited post... nice one. fracture ke chalte baad me tippanni likhoonga...dayanidhi..

Comic World said...

Pradeep Singh: Well,SMP has never claimed of him being 100% original,in fact many times he confessed about copying a particular story from some other source,a quality which is very rare among pulp fiction authors as no other writer has dared to confess this though many of them openly copies.

Comic World said...

Dayanidhi: What happened bro? are you all right now!

Anonymous said...

comik bhai ye apne pathak saab ke pathko ki vo khidmat ki hai jiska koi javab nahi .Main aap ki mehnat ko salute karta hun aur dil se itana badhiya classy review dene ki liye badhayi deta hun.-----Dr.Rajesh Parashar

Comic World said...

Dr.Rajesh Parashar: शुक्रिया डॉ.साहब,ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है | जी हाँ,पाठक साहब जिस सम्मान के हक़दार हैं वो उन्हें अभी तक नहीं मिला,मौजूदा पोस्ट पाठक साहब की शान में अक़ीदतमंदी की महज़ एक छोटी सी कोशिश मात्र है |

ukp said...

Sir,
Bahut badhiya.I am also a fan of SMP,there is nobody to touch him.Do you have the old books of Ved Prakash Kamboj.

dayanidhi said...

Bhai, apni mulaqat ke do din baad accident me haath me fracture ho gaya, accident me mobile bhi gum gaya hai, mujhe apna number sms kar dena, plz....944 par.. yaar ye word verification hata do, plz...

Anonymous said...

जहीर भाई..
एक बेहद उम्दा पोस्ट.. पर मुझे याद नहीं पड़ता आपके किसी भी पोस्ट का पहला कमेन्ट इतना सटीक हो ( श्री प्रदीप ) कि मेरे लिखने की रूप रेखा मुझे बदलनी पड़े. ऐसा क्यों कह रहा हू उस पर थोड़ी देर में आता हू.
दोस्तों जैसा आप सब जानते है हिंदी पल्प साहित्य की दुनिया उजड़े एक जमाना हो गया और ऐसा इसलिए कह रहा हू की एक्का दुक्का को छोरकर पुराने नामचीन लेखको जिनका की नाम जहीर भाई ने अपने पुराने पोस्ट में जिक्र किया आज कही मौजूद नहीं है. और वर्तमान में एक्का दुक्का में सर्वोपरि श्री सुरेंदर मोहन पाठक साहेब है जिनकी लेखनी के बारे में जहीर भाई ने ऊपर बयां किया. जहीर भाई कहते है की मै इतनी दूर रहते हुए भी पाठक साहेब से इतना मुतासिर क्यों हु तो उसकी एकमात्र वजह यह है की मै अपने हिंदी पल्प पढने की आदत को छोरना नहीं चाहता और अफ़सोस की श्री पाठक के उपन्यासों अलावा ऐसा कोई लेखक अब उपलब्ध नहीं जो इस पुराने शौक को बरक़रार रखने के लिए मददगार साबित हो. इसके पहले मै पाठक साहेब के बारे में अपनी राय जाहीर करू सबसे पहली बात तो ये की जितने "कट्टर" समर्थक मैंने पाठक साहेब के देखे उतने किसी लेखक के नहीं. अब ये उनकी लेखनी का जादू है या उनके प्रसिद्ध किरदारों ( सुनील , विमल ) से प्रभावित जेहन जो ये समझते है की "भाई उपन्यास लिखाई हो तो पाठक जैसी हो या न हो" . ऑरकुट पे पाठक साहेब के फोरम में किसी अन्य पल्प रायटर की पाठक साहेब की तुलना करना मतलब तमाम मेम्बरान से तीखी प्रतिक्रिया झेलना जो अपने कई यार दोस्त फेस कर चुके है.

आगे और है..

kuldeep

Anonymous said...

मै ये तो नहीं कहता की मै पाठक साहेब का अव्वल नंबर का फेन हू तब जबकि मै यहाँ सिडनी में जनाब सुधीर बराक के रूबरू हो चूका हू जो की पाठक साहेब के बेहद जबरदस्त पढने वाले और संग्रहकर्ता है. उनके अलावा पाठक साहेब के पढने वालो में मै एक श्री जीतेन्द्र माथुर से परिचित हुआ जिनका जिक्र पाठक साहेब अपने बेहद लोकप्रिय लेखकीय में अक्सर करते है. आपको ये मानना पड़ेगा की पाठक साहेब की लेखनी से प्रभावित एक बेहद विशिष्ट वर्ग है और पाठक साहेब के जयादातर पुराने और नए उपन्यास इस वर्ग की कसौटी पर खरे उतारते है और येही एक वजह है की उनके जादू से निकलना अभी तो किसी के लिए मुमकिन नहीं.
ज़हीर भाई खुद तस्दीक करते है की वो पाठक साहेब के मुरीद अभी हाल में ही हुए है और मै पाठक साहेब को एक लम्बे अरसे से पढ़ रहा हू क्योकि और कोई "अच्छा" लिखने वाला बचा ही नहीं. ऐसा नही है की मै शुरू से ही पाठक साहेब के उपन्यासों का रसिया था. उनके कई उपन्यास पढ़े और रख दिए. उनके नाम ने जेहन पर ऐसा कोई जूनून नहीं छोरा की बस पढना ही है ... उनके बेहद प्रसिद्ध उपन्यास असफल अभियान सिरिस, बखिया सिरिस से मेरा पाला बाद में पड़ा और उसके पहले मैंने पाठक साहेब के जो भी उपन्यास पढ़े वो सिर्फ पढ़े.. दिमाग के किसी कोने में उनकी याद समेट के रखी ऐसा कतई नहीं था. मेरे पूर्व निवास स्थान रायगढ़ में बुक स्टाल पे मैंने पाठक साहेब के उपन्यास जैसे की १० मिनट , जीना यहाँ , लेख की रेखा जैसे नाम देखे और कभी ध्यान नहीं दिया क्योकि उस समय दिलो दिमाग पर कोई और ही लेखक सवार था. उस लेखक के सारे उपन्यास "चाट" जाने के बाद पाठक साहेब को पढना शुरू किया और उनके जिस उपन्यास ने सबसे जायदा जेहन में घंटी बजाई वो था " जहाज का पंछी" वाली तिकड़ी ने.

आगे और है..

kuldeep

Anonymous said...

इस उपन्यास के कथानक, कहानी का उठान , पाठक साहेब की भाषा के जादू ने जेहन में वो जादू जगाया की उनके उपन्यासों से फिर न टूटने वाला नाता बनना ही था. और इस तिकड़ी के बाद ही मैने बखिया सिरिस , असफल अभियान और कहे तो विमल की पूरी सिरिस आत्मसात की.
पाठक साहबे के नए या पुराने पढने वालो में शायद ही कोई ऐसा होगा जो बखिया सिरिस के जादू से अपने को परे रख पाए.
"साहेबान अपने सिपहसलार की नामौजिदगी बखिया को बहुत खटक रही है"
अगर " जहाज का पंछी" में पाठक साहेब की भाषा का जादू सर चढ़कर बोला तो साहेबान बखिया सिरिस में उनके घटनाओ का , घात प्रतिघात को लिखने का अंदाज दिमाग पर छा गया . और नतीजा ये की आज भी पाठक साहेब के उपन्यास पढने की तलब बनी हुई है जो इतनी दूर रहते हुए भी ज़हीर भाई जैसे , सुधीर साहेब जैसे मेहरबानो के द्वारा पूरी होती रहती है.
पर दोस्तों इस कहानी का दूसरा रुख ये है की पाठक साहेब से उम्मीदे बढ़ गयी है और जब उनके नए उपन्यास एकरसता लिए हुए नजर आते है और साथ में ये भी पता चलता है की उनके उपन्यास अंगेरजी उपन्यासों से कॉपी किये हुए है तो दिल टूट जाता है. यहाँ पर आप सबको सावधान करूँगा की आपका ये कहना कई पाठक प्रेमिओ को नाराज़ कर सकता है. मिसाल के तौर पर मुझे पता चला की पाठक साहेब का एक उपन्यास अर्ल स्टान्ली गार्डनर के उपन्यास से उठाया गया है.. मैंने गार्डनर का वो उपन्यास पढ़ा और जाना की पाठक जी का पूरा उपन्यास फ्रेम टू फ्रेम कॉपी था . उनका किरदार जो कहता है वो भी अक्षरश अनुवाद ही था.

आगे और है..

kuldeep

Anonymous said...

दिल को चोट पहुची और उस चोट का नतीजा ये हुआ की अब नजर पाठक के उपन्यासों को नुक्ता चीनी की निगाहों से भी देखने लगी है. उनके उपन्यासों के प्रसंग लगता है पहले उपन्यासों में पढ़े हुए है. नए उपन्यास पढने के पहले ये शक पहले आता है की यह भी तो कही कॉपी किया हुआ नहीं.
हाल में प्रकाशित उनकी मकबूल विमल की तिकड़ी " चेम्बूर का दाता " बहुतो की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी और जबसे उनके उपन्यास सफ़ेद कागज में छपने में शुरू हुए है एक आध को छोरकर जयादातर में मै नुक्स निकल सकता हू.

जैसा की लोग जानते है पाठक साहेब के किरदार विमल की बुनियाद जेम्स हेडली चेस के उपन्यास थे और सुनील के उपन्यास अर्ल स्टान्ली गार्डनर से प्रेरित है अब ऐसे में दिमाग में सवाल ये आता है की कही ऐसा तो नहीं की इनके थ्रिलर भी कही से उठाये गए है ?
अज्ञानता कभी कभी वरदान होती है.. इसका खुलासा न हो तो ही अच्छा है क्योकि तब एक ही बात दिमाग में आएगी की हम भारतीय क्या कुछ अपने दिमाग से करते है या फिल्मो की तरह बस बाहर से कॉपी करना ही जानते है.

आगे और है..

kuldeep

Comic World said...

UKP: Thanks and welcome.Well,i may be having few novels of Ved Prakash Kamboj with me.

Comic World said...

Dayanidhi: Sorry to hear bro,well,hope you will be fine soon.SMSing you the no. soon,the word verification keeps away a hell no. of spam comments which otherwise are bound to flood the each and every post of blog so kindly bear it with me.

Comic World said...

Kuldeep Bhai: कुलदीप भाई सबसे पहले आपकी दिल से लिखी गई वुसअत(long & wide) कमेन्ट का बेहद शुक्रिया जो आपने अपने हस्बे-मामूल पर खरे उतरते हुए लिखीं |
उसके बाद मैं आपको बता दूं की मौजूदा पोस्ट पाठक जी की विमल सिरीज़ और थ्रिलर जैसे की 'कांपता शहर,डायल १००,बीस लाख का बकरा' जैसे उपन्यासों के पढ़ने से उपजी शैदाईयत का नतीजा है | ऐसा हरगिज़ नहीं है की मुझे पाठक जी के तमाम वो उपन्यास जो मैंने पढ़े सारे के सारे अतुलनीय एवं अनोखे लगे,कई बार ऐसा भी हुआ की मुझे सुनील सिरीज़ के कई उपन्यास पढ़ते-पढ़ते बीच में ही बदमज़गी के कारण छोड़ना पड़े और ऐसा कई दूसरी सिरीज़ के उपन्यासों के साथ भी हुआ सिवाय एकलौती विमल सिरीज़ को छोड़कर जिसके सारे के सारे उपन्यास मुझे बेहद पसंद आ रहे हैं(यहाँ यह उल्लेखनीय है की अभी तक मैंने विमल सिरीज़ के सिर्फ़ पहले २७ उपन्यास ही पढ़े हैं)|
continued..

Comic World said...

....
विमल सिरीज़,जिसका की पहला उपन्यास 1970 में प्रकाशित हुआ था,अगर वो आज चालीस साल बाद भी अपना मज़ा और कलेवर बरक़रार रखे हुए है तो यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है पाठक साहब की |

'जहाज़ का पंछी' वाली तिकड़ी,'असफल अभियान-खाली वार' श्रुंखला और 'बखिया पुराण' की चौकड़ी-यह सारे उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे कोई बेहद तेज़ रफ़्तार एक्शन,जासूसी और थ्रिल से भरी बेहद रोमांचक फ़िल्म देखी जा रही है |
बखिया पुराण में बखिया जैसा क्या शानदार चरित्र गढ़ा था पाठक साहब ने-एक ऐसा चरित्र जो चारित्रिक रूप से बेहद मज़बूत था और जिसके अंत पर जिसे पाठकों की सहानभूति प्राप्त होती है |

खैर,जहाँ तक नक़ल मारने या कॉपी करने की बात है तो सिर्फ़ चरित्रों का ढांचा कॉपी करने या उसकी प्रेरणा पाने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि ऐसे तो वेद प्रकाश शर्मा के विजय,अल्फान्से भी वेद प्रकाश कम्बोज के पात्रों से उठाये गए हैं जिन्हें बदले में कम्बोज जी ने भी इब्ने सफ़ी के 'इमरान' से 'प्रेरणा' पाकर गढ़ा |

अगर कोई भी लेखक किसी के महज़ पात्रों की कॉपी करता है और बाकी के पूरे के पूरे कथानक में अपनी सलाहियत द्वारा ओरिजिनल रंग भरता है तो उसे नक़ल मारना नहीं कहा जाएगा लेकिन हाँ अगर,जैसा के आपने बताया की पाठक जी का एक उपन्यास फ्रेम दर फ्रेम और संवाद दर संवाद किसी अंग्रेजी उपन्यास से मिलता है तो उसे ज़रूर सिवाय कॉपी करने की कुछ नहीं कहा जा सकता जो पाठक जी के मुरीदों के लिए वाकई में दिल तोड़ने वाली बात है |

continued....

Comic World said...

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आपने बताया की सुनील सिरीज़ के उपन्यास अर्ल स्टान्ली गार्डनर से प्रेरित हैं लेकिन क्या विमल सिरीज़ के उपन्यास भी किसी अन्य इंग्लिश लेखक से 'प्रेरणा' की हद से अधिक मिलते हैं ?
यदि हाँ तो उस लेखक और उपन्यासों के नाम बताएं जिससे की तस्दीक की जा सके |

दयानिधि said...

कुछ नावेल में प्लाट मिलता जरूर था, लेकिन उन्हें भारातीय परिवेश में ढालना भी बहुत बड़ा काम है. एक ही मूल राग पर कई गाने बनाये जाते है, लेकिन उन्हें अलग रूप में ढालना एक अलग बात होती है. इसलिये पाठक जी पर तोहमत के रूप में लेना ठीक नहीं.

Anonymous said...

Since Mr.Pathak translated a lot of novels in start of his career, the possibilities of taking plots for his NOVELS may not be ruled out.

kuldeepjain said...

जहीर भाई.
ऑरकुट में पाठक साहेब के कई जहीन पढने वालो ने ये बयां किया है की विमल का किरदार भी किसी अंगेरजी किरदार से प्रेरित है. नाम तो मुझे अभी याद नहीं और अब ढूंढने का कोई मतलब भी नहीं. पर इस सन्दर्भ में मै २ बाते कहना चाहूँगा की विमल के पहले उपन्यास मौत का खेल जैसी कहानी (जो की जेम्स हेडली चेस के उपन्यास पर बेस्ड था) पर मैंने एक हिंदी फिल्म बहुत पहले दूरदर्शन पर देखी थी जिसमे विमल सरीखा रोल शत्रुघ्न सिन्हा साहेब ने निभाया था . और अगर आप मेल गिब्सन ( होलीवुड अभिनेता) की मूवी पे-बेक देखेंगे तो आपको बखिया सिरिस और विमल की दास्ताँ याद आ जायेगी.
अब किसने किसको कॉपी किया ये एक रिसर्च का मुद्दा है.
जैसा की कहा गया की पाठक साहेब पहले अनुवाद किया करते थे तो उनके उपन्यास किसी और के उपन्यासों पर आधारित हो सकते है और उन्हें भारतीय परिवेश में ढालना एक बहुत बड़ा काम है. और इसको पाठक जी पर तोहमत के रूप में लेना ठीक नहीं.. हो सकता है क्योकि हमारी पिक्चर भी तो हर जगह से उठाई गयी है. और भारतीय परिवेश में ढालना एक वाकई बहुत बड़ा काम है क्योकि किसी अंगेरजी किताब का शब्द दर शब्द हिंदी अनुवाद कतई मजा नहीं देता. मिसाल के तौर पर मैंने मारिओ पूजो की गाड फादर अंगेरजी में भी पढ़ी और पाठक साहेब द्वारा हिंदी में अनुवादित भी पढ़ी और हिंदी वाली पूरी पढ़ भी नहीं पाया.
ये तो हर हाल में मानना पड़ेगा की शब्दों का , भाषा विन्यास का, हास्य का , भावनाओ का , प्रसिद्ध उधरनो का जो सामंजस्य पाठक साहेब प्रस्तुत करते है वो वाकई एक सुर में सबसे यही कहलाती है
"अल्लाह करे ज़ोर-ऐ-क़लम और भी ज़ियादा"

dayanidhi said...

ek haath se type karna badi dikkat ka kaam hai, jaheer bhai aap ki kalam ka jor bhi jiyada ho, aur jiyada.... dayanidhi,

Comic World said...

Dayanidhi: Thanks Bro.

Big Time Blogger said...

very nice blog
check mine :-)

download-dc-new-52.blogspot.com/

Anonymous said...

Kuldeep ji vimal ka character Richard stark ke ek character Parker se uthaya gaya hai .Kai jagah to pura ghatnakram hi is series se copy hua hai.Slay ground se lekh ki rekha ka parijat studio prasang /Deadly edge se daulat aur khoon ka first half.Karmyodha bhi copy kiya hua hai parar ke novel ka naam yaad nahi aa raha hai.Upar likhe novel maine padhen hain.----Dr.Parashar

CHAITNYA said...

मैँ भी थ्रिलर का शौकीन हूँ जहाँ भी गया सबसे पहले डीवीडी और उपन्यासोँ की लाइब्रेरी खोजता हूँ मुझे स्वतंत्र कथानक वाले थ्रिलर उपन्यास और फिल्मेँ पसन्द हैँ पाठक जी का 'कोई गवाह नहीँ' मुझे याद है और वेदप्रकाश शर्मा का 'गूँगा' बहुत पसन्द आया विजय विकास सीरीज मेँ मेरी पसन्द है 'चीख उठा हिमालय' और थ्रिलर मेँ बेस्ट है 'हत्यारा कौन' और 'कानून बदल डालो' जो शुद्ध थ्रिलर है के अगले भाग'फाँसी दो कानून को' मेँ उन्होँने विजय विकास को लाकर बेकार कर दिया और 'मेरा घर मेरे बच्चे' के अगले भाग 'आज का रावण' के अन्त मेँ अलौकिक शक्ति भूत प्रेत की बात करके बेमजा कर दिया,पाठक जी के नावेल मैँ थ्रिलर के बाद सुनील और सुधीर सीरीज ही पढ़ता हूँ विमल सीरीज मुझे पसन्द नहीँ है मैँ अँग्रेजी तो नहीँ पढ़ पाता लेकिन ओरिजनल की खोज अवश्य करता हैँ जैसे फिल्म 'भूलभुलैया' दक्षिण की फिल्म 'चँद्रमुखी' की रिमेक है और ये भी एक मलयालम फिल्म की रीमेक है, थ्रिलर फिल्मोँ के अन्त मेँ कई बार निर्देशक कुछ प्रश्नोँ के उत्तर देना भूल जाते हैँ जैसा कि अक्षय कुमार की 'भूलभुलैया' मेँ हुआ,संजय दत्त की 'जिन्दा' गजब की थ्रिलर है कृपया आप लोग इसकी मूल फिल्म बतायेँ और थ्रिलर फिल्मोँ मेँ पुरानी जानी दुश्मन,छत्तीस घण्टे,कानून,धुन्ध, आदि हैँ मेरे पास इस समय नावेल वेद के हैँ 'गूँगा' 'भगवान न02' 'आज का रावण' और पाठक जी का 'घात' वेदप्रकाश शर्मा ने अभी कुछ साल पहले एक बहुत ही घटिया नावेल लिख दिया है 'नौकरी डाट काम' इसके बाद आये 'खेल गया खेल'सूपरस्टार' और 'पैँतरा' अभी मैँ नहीँ पढ़ पाया हूँ मैँ जौनपुर (ऊ0प्र0) मेँ रहता हूँ कृपया आप सब मुझे फोन करेँ और अपना नम्बर देँ 09559905060ईमेल Ps50236@gmail.com

Binay said...

first of all, apologies for writing in english, as I am not able to type in hindi. I love SMP, and this love is unconditional, because of his writing, knowing that a lot of his work is copied. But why not, he himself always mention this in his editorials. He don't even consider himself a writer, as he has to write with a schedule, and it can only be done with binding together events and plots from here and there. But even if it is copied, why not other Indian writers can touch the same level of popularity by using the same method? Because it is Pathak Saheb's writing which makes it unique!

manu said...

BHAIYO YE SUCH BHI HAI KI KUCH NOVAL COY KIYE HUE HAIN TO BHI...... TO BHI AAP LOGO NE SHAYED UNKI LEKHIKAY PER DHYAAN DIYA HO ! UNKA HAR EK LEKAKIYE APNE AAP MAIN ADITYA HOTA HAI KISI KISI NOVAL KE LEKH.. MAIN TO UNKE JANKARI ITNI ROCHAK HOTI HAI JISKA JAWAB NAHI JAISE EK LEKH.. MAI UNHONE URDU OR PUNJABI BHASHA KE LIKNE OR BOLENE KE BARE ME LIKKHA... EK MAI PATIYAL PEG OR EK MAIN JASUSI SANSTHAO KE MARE MAIN ... EK MAI WRITER KE BARE MAI, YANI HEER LEKHAKIYA KI ABNI EK AYSI KHUBI JO KABHI KABHI NOVAL SE JAYDA DILCHASP OR SHANDAAR MANORANJAN OR JANKARI KA VAYAS BANTI HAI
JARA IS PAR BHI GOUR FARMAI

CHAITNYA said...

वेदप्रकाश शर्मा का 'सुपरस्टार' और 'पैँतरा' मैने पढ़ लिया है अच्छे थ्रिलर नावेल हैँ ऊपर अनेक फालतू कमेन्ट्स आ गये हैँ उन्हेँ रिमूव कर देँ

CHAITNYA said...

वेदप्रकाश शर्मा का 'खेल गया खेल' मैने पढ़ लिया है

anurag said...

Hi I read Grihasth Vaital....Its true that Phantom is the King of Comic World...an unparalleled character...I love him...as a child he use to come in my dreams also...Thanks a lot COMIC WORLD!!!

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