Saturday, June 1, 2013

# Fabulous Filmfare

दोस्तों,अगर आज़ाद हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी रिसालों(पत्रिकाओं) की बात की जाये तो ज़ेहन में बिलाशुबह 'फ़िल्मफ़ेयर' का नाम सबसे पहले उभरता है । हिंदुस्तान,जहाँ फ़िल्में और क्रिकेट को किसी धर्म से कम नहीं माना जाता वहाँ आम जनमानस तक फ़िल्में और फ़िल्मी सितारों की खबरें पहुँचाने में इन फ़िल्मी रिसालों का बहुत बड़ा हाथ है और आज हम बात करेंगे ऐसी ही एक फ़िल्मी पत्रिका के बारे में जो सन 1952 से लेकर आज तक किसी सितारे की तरह जगमगा रही है । 

सन 1838 में आरम्भ हुए टाइम्स ग्रुप ने आज़ादी के बाद महसूस किया कि फ़िल्में एक सशक्त लोकप्रिय माध्यम बनकर उभरी हैं और इस क्षेत्र में एक 'यूजर फ्रेंडली' पत्रिका की कमी है क्योंकि उस दौर में लोकप्रियता की चोटी पर बाबुराव पटेल की 'फिल्म इंडिया' थी जो मुख्यतया: फ़िल्मी समीक्षाओं पर अपने तेज़ाबी आलेखों और अदाकारों की कटु आलोचना के लिए जानी जाती थी । 
चूँकि फ़िल्म इंडिया अपने लेखों और समीक्षाओं में सितारों की टांग खींचने में कोई कसर नहीं रखा करती थी अत: यह सितारों की गुड बुक में कभी नहीं रही जिसके चलते टाइम्स ग्रुप ने ऐसा महसूस किया कि सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता के फलस्वरूप हिंदुस्तानी सिने-प्रेमी सितारों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानने के इच्छुक हैं इसलिए उन्होंने एक ऐसी फ़िल्मी पत्रिका की परिकल्पना की जिसके सितारों के साथ मधुर सम्बन्ध हों और जो इनके फ़िल्मी और निजी जीवन के क्रियाकलापों के बारे में और करीब से जानने की एक आम सिने-दर्शक की क्षुधा को शांत कर सके । लिहाज़ा 'फ़िल्मफ़ेयर' वजूद में आई और अंग्रेज़ी भाषा एवं आठ आने क़ीमत वाला इसका प्रथम अंक 7 मार्च 1952 की मोहर लिए बाज़ार में आया जिसके कवर पर कामिनी कौशल की तस्वीर थी । 





        























आरम्भ में इसे कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिली और यह दूसरी फ़िल्मी पत्रिकाओं की भांति ही बिना कोई ख़ास हलचल मचाये फ़िल्मी प्रिंट मीडिया का हिस्सा बनी रही । 'फ़िल्मफ़ेयर' की लोकप्रियता में क्रांतिकारी उछाल आया सन 1954 में जिस साल से हॉलीवुड के ऑस्कर अवार्ड्स की तर्ज़ पर टाइम्स ग्रुप ने फिल्मफेयर अवार्ड्स वितरण करना आरम्भ किये । 21 मार्च 1954 के दिन पहला अवार्ड समारोह आयोजित किया गया था जिसके अंतर्गत पाँच अवार्ड्स-सर्वश्रेष्ठ फिल्म,एक्टर,एक्ट्रेस,निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार-दिए गए थे और उसके बाद यह अवार्ड समारोह 'फ़िल्मफ़ेयर' का एक नियमित वार्षिक फीचर बन गया । दरअसल अवार्ड वितरण समारोह ही वह कारक था जिसने 'फ़िल्मफ़ेयर' की लोकप्रियता में भारी इज़ाफा किया क्योंकि उस दौर में हिंदुस्तानी फ़िल्मों और उनके कलाकारों को नवाज़ने वाली कोई भी देसी संस्था नहीं थी । 

इस अवार्ड फंक्शन ने 'फ़िल्मफ़ेयर' को फ़िल्मी सितारों के बीच बेहद लोकप्रिय और सम्मानित बनाया जिसके बाद 'फ़िल्मफ़ेयर' अवार्ड हासिल करना फ़िल्मी दुनिया में बड़े सम्मान की बात समझी जाने लगी । 'फ़िल्मफ़ेयर' पत्रिका ने सितारों और उनकी फ़िल्मों के बारे में लिखने में भी मॉडरेट पालिसी अपनाई जिसके अंतर्गत सितारों के निजी जीवन के बारे में खुर्दबीनी लेख लिखने से परहेज़ रखा गया और फ़िल्मों की समीक्षा में आलोचना के स्वरों की धार को भी बाबुराव पटेल की फिल्म इंडिया जैसी तीखा एवं पैना न रखकर अपेक्षाकृत कुंद और मृदु रखा गया जिसके चलते 'फ़िल्मफ़ेयर' ने सितारों का विश्वास तो जीता ही लेकिन साथ ही साथ आम सिने-दर्शक के मन में भी जगह बनायीं । 




           





















मुख्यतया: अवार्ड समारोह आयोजन के चलते 'फिल्मफेयर' ने हिंदी फ़िल्म उद्योग में अपना एक अमिट और महत्वपूर्ण स्थान बना लिया जो आज भी कमोबेश जारी है । चूँकि 
'फिल्मफेयर' ने ही किसी भी किस्म के फ़िल्म अवार्ड्स प्रदान करने की परंपरा रखी थी इसलिए भले ही आज अवार्ड्स वितरण करने वाली संस्थाओं की बाढ़ आ गई हो लेकिन 'फिल्मफेयर' अवार्ड्स का आज भी अपना ही एक अलग महत्त्व और आकर्षण है ।

जे सी जैन के संपादन से आरम्भ हुई इस पत्रिका के आरंभिक दौर में भारतीयों हिंदी फिल्मों के साथ-साथ हॉलीवुड और लाहौर से बनने वाली पाकिस्तानी फिल्मों का भी उल्लेख किया जाता था जो कालांतर में सिर्फ़ हिंदी और दक्षिण भारतीय फ़िल्मों एवं यदा-कदा अंग्रेज़ी फ़िल्मों के ज़िक्र तक सिमट कर रह गया ।  
'फ़िल्मफेयर' पत्रिका की खूबियों या विशेषताओं की अगर बात करें तो उनमे सबसे पहले इस रिसाले में प्रकाशित होने वाले सितारों की मनमोहक तस्वीरों का ज़िक्र किया जाएगा । 



   




































टेबलायड आकार की इस पत्रिका में पूरे पन्ने पर छपी सितारों की तसवीरें बेहद नयनभिराम होती थीं ।  इसके अलावा टेलीविज़न/केबल इत्यादि संचार माध्यमों से रहित उस दौर में प्रत्येक वर्ष आयोजित किये जाने वाले 'फ़िल्मफ़ेयर' अवार्ड समारोह की रिपोर्ट भी पत्रिका में प्रकाशित की जाती थी जिसका भी अपना एक अलग ही आकर्षण और महत्त्व था ।  'फ़िल्मफ़ेयर' अवार्ड की महत्ता इतनी बढ़ी की उसे हासिल करने के लिए बाद के वर्षों में जोड़-तोड़ का भी सहारा लिया जाने लगा जैसे कि एक समय में अवार्ड्स के चुनाव हेतु पत्रिका में छपे पोलिंग फॉर्म्स द्वारा जनता का वोट लिया जाता था और उसके आधार पर अवार्ड्स के क़ाबिल फ़िल्मों का चुनाव किया जाता था लेकिन ऐसा भी सुनने/पढ़ने में आया की किसी वांछित फ़िल्म्स को विजेता घोषित करवाने के लिए उस ग्रुप के लोगों द्वारा पत्रिका के ढेरों अंकों को खरीद कर अपनी वांछित फ़िल्म को ही वोट दिया जाता था ।
खैर,सच्चाई चाहें जो भी रही हो लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं है कि लगभग तीन दशकों तक 'फ़िल्मफ़ेयर' अवार्ड और 'फ़िल्मफ़ेयर' पत्रिका का एकछत्र राज रहा जिसके चलते यह समूचे फ़िल्म उद्योग की लाड़ली पत्रिका बनी रही ।
 सामान्य आकार से आरम्भ होकर इस पत्रिका ने कालांतर में टेबलायड आकार लिया और अस्सी के दशक में पुन: सामान्य आकार में प्रकाशित होने लगी जो अब भी जारी है ।








































इस पत्रिका की एक और खासियत से इसकी समीक्षाएं जो काफी हद तक सटीक और न्याय-पूरक होती थीं । 


























इसके अलावा इसमें समय-समय पर दिग्गजों द्वारा लिखित बेहतरीन लेख भी प्रकाशित हुआ करते थे, जैसे मिसाल के तौर पर यह लेख है जिसे मशहूर संगीतकार शंकर-जयकिशन ने लिखा था और जिसमे ये जोड़ी किसी गीत के जन्म/सृजन पर प्रकाश डाल रही है ।  



























काफ़ी मुश्किल से मिलने वाले इसके पुराने अंक किसी पुरानी यादों से भरी डायरी से कम नहीं हैं जिसे देख कर इन बीते हुए ज़माने के अदाकारों की यादें ताज़ा हो जाती हैं । 




















































































सत्तर,अस्सी के दशक में बदलते समय के अनुसार 'फ़िल्मफ़ेयर' में भी बदलाव आया और इसने फ़िल्मों के दीगर पहलुओं पर भी नज़र रखना शुरू कर दी । 






























































जैन,बी.के.करंजिया,बिक्रम सिंह,रउफ अहमद जैसे संपादकों के दक्ष हाथो द्वारा समयनुसार इसके स्वरुप में निखार आता गया और मौजूदा समय में इसकी कमान जितेन्द्र पिल्लई के हाथों में है जो कोशिश करते रहते हैं कि समय-समय पर पत्रिका में उसी पुराने 'टच' की झलक मिलती रहे लेकिन प्रिंट मीडिया में लोगों की घटती रूचि के चलते वे व्यावसायिक तौर पर समझौता करने को मजबूर है जिसकी वजह से मौजूदा समय में 'फ़िल्मफ़ेयर' में सार्थक,मायनेखेज़ और फ़िल्म विद्या से जुड़े गंभीर सिने आलेखों के बजाय सितारों से जुड़े ग्लैमर,उनकी पोशाकों एवं उनकी गतिविधियों और पार्टियों की चर्चा पर ज़्यादा तवज्जो दी जाती है । 


खैर,जो भी हो लेकिन इतनी गिरावटों के बावजूद 'फ़िल्मफ़ेयर' का चार्म बनिस्बत दूसरी फ़िल्म पत्रिकाओं के अभी भी क़ायम है जोकि उम्मीद करते है कि आगे और भी अच्छी तरह से क़ायम रहेगा । 



    



7 comments:

kuldeepjain said...

बाप रे बाप इतने पुराने कवर ? जहीर भाई ये कवर न जाने कितनी यादो के तारो को छेड़ रहे है. निसंदेह एक वक़्त था जब फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका का एकछत्र राज रहा जिसके चलते यह समूचे फ़िल्म उद्योग की लाड़ली पत्रिका बनी रही और शायद इसी पत्रिका का इन्फेक्शन था की चित्रलेखा ,सुषमा , फ़िल्मी कलिया , फ़िल्मी दुनिया , मूवी जगत , माधुरी जैसी पत्रिकाए बाजार में आई और अपना अपना रंग ज़माने की कोशिश करती रही . इस बारे में कोई दो राय नहीं की फ़िल्मफ़ेयर में पूरे पन्ने पर छपी सितारों की तसवीरें बेहद नयनभिराम होती थीं और ये शायद किसी भी फिल्म के शौक़ीन की पहली प्राथमिकता होती थी की वो ऐसी किसी फिल्म पत्रिका के लिए लपकता था . पर शायद आपको याद होगा कि ८० 's की फ़िल्मी पत्रिकाओं में एक और खास बात होती थी वो था आने वाली फिल्म की पूरी कहानी संवाद सहित. किसी आने वाली नयी फिल्म का ट्रेलर देखने का सयोग तो सिर्फ हाल में मिलता था पर फिल्म की कहानी संवाद सहित पढने का आनंद ये फ़िल्म पत्रिकाए ही देती थी। विडियो के आने के बाद इन पत्रिको के दिन ढलने शुरू हुए और " लहरे " जैसी विडिओ मैगजीन ने बहुत पहले से इन पत्रिकाओ के रंग धुन्दले करने शुरू कर दिए थे । सिडनी में भारतीय दुकानों में आज भी फ़िल्मफ़ेयर टंगी दिख जाती है पर अब इस पत्रिका को देखकर दिल में एक टीस उठती है , पुराने बुक स्टालों की तस्वीर दिल में आती है पर पत्रिका को पढने की कोई ललक नहीं आती। मोहम्मद रफ़ी , अमिताभ , लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल को पसंद करने वाला मल्लिका शेरावत, विशाल शेखर के लिये लगाव लाये तो कहा से लाये ।

एक बार फिर बेहद शानदार प्रस्तुति ..

मोहम्मद कासिम said...

nice post zaheer bahi

Sukriya

Comic World said...

शुक्रिया कुलदीप । मैं आपकी बात से सहमत हूँ । तफ्सीली जवाब ज़रा आराम से लिखूंगा ।

Comic World said...

Thanks Qasim Bhai.

aditya M said...

kalam ke funkar zaheer bhai ko mera salaam

itna shandar article padh ke dil khush ho gaya

kya or bhi covers aap ke pas hain?

Kripya kisi chuninda film ki samiksha likhen

aapka
Aditya

Comic World said...

Thanks Aditya bhai,kindly let me know which film you wished to be reviewed by my humble self.

Ruchika said...

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