Saturday, January 11, 2014

Sholay: The Unknown Facts

शताब्दी की फ़िल्म घोषित की गयी फ़िल्म 'शोले' एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि इस जनवरी इसे थ्री-डी फॉर्मेट में रिलीज़ किया गया है । वैसे तो इस फ़िल्म के मुताल्लिक इतना लिखा जा चुका है कि शायद ही इस फ़िल्म का कोई ऐसा पहलु बाकी हो जिसपर तब्सिरा या चर्चा न की जा चुकी हो या जो इस फ़िल्म के कट्टर शैदाईयों की नज़रो से छुपा हो । 









इस पोस्ट का मक़सद दोबारा उन बातों को लिखना नहीं है जो पहले से ही लिखी/पढ़ी जा चुकी हों बल्कि इस पोस्ट का मक़सद कुछ उन सवालों के जवाब ढूंढना भर है जो अभी भी किसी 'शोले-बाज़' को परेशान करते रहते हैं या अनुत्तरित हैं । मिसाल के तौर पर हम सभी जानते हैं कि इस फ़िल्म का अंत वह नहीं था जो हम सब देखते आ रहे हैं बल्कि इस फ़िल्म का मूल रूप से लिखा/फ़िल्माया गया अंत वह था जिसमे ठाकुर के जूतों तले कुचल कर गब्बर की मौत होती है लेकिन जिसे सेंसर बोर्ड की उस वक़्त की नीतियों के चलते अति-हिंसावादी एवं कानून-व्यवस्था का मान न रखता हुआ करार देकर बदलवाया गया था । यह मूल अंत यु-ट्यूब इत्यादि पर उपलब्ध है जिसके बारे में इसी ब्लॉग पर शोले पर आधारित एक पिछली पोस्ट पर चर्चा की जा चुकी है । ठीक इसी तरह सचिन को यंत्रणा देकर मारने के दृश्य को संपादन की भेंट चढ़ा दिया गया था जिसके बारे में भी कॉमिक वर्ल्ड पर चर्चा की जा चुकी थी । 




यह सारे दृश्य तो वह थे जिनके बारे में सब लोग जानते ही हैं लेकिन इनके अलावा फ़िल्म में एक क़व्वाली भी थी जिसके बोल थे 'चाँद सा कोई चेहरा न पहलू में हो ..........' और जिसे गाया था किशोर कुमार, मन्ना डे, भूपेंद्र और आनंद बक्षी ने जिसे रिकॉर्ड तो किया गया था लेकिन फ़िल्माया नहीं गया था । इस क़व्वाली के बारे में भी काफ़ी क़यास हैं कि इस क़व्वाली को फ़िल्म में कहाँ रखा जाना था, कोई कहता है कि इस क़व्वाली को जेल में वीरू और जय को अपने जेल के साथियों के साथ गाना था तो कोई कहता है कि जब गब्बर जेल से भागा था तो पुलिस से बचने के लिए वह एक कोठे में घुस गया था जहाँ यह क़व्वाली चल रही थी । इसके अलावा फ़िल्म के कई संवाद ऐसे भी हैं जो अलग-अलग माध्यमों जैसे की एलपी रिकॉर्ड या फ़िल्म रील में अलग-अलग है जैसे कि धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के गोली चलाना सीखने वाले दृश्य में पेड़ के नीचे लेटा हुआ जय कहता है कि 'हाँ जेम्स बॉन्ड के पोते हैं यह' लेकिन इसी संवाद को मैंने अपने बचपन में इस फ़िल्म के छोटे आकार के एलपी रिकॉर्ड पर सुना है जिसमे जय कहता है कि 'हाँ तात्या टोपे के पोते हैं यह' । इसी प्रकार के कई संवाद हैं जोकि सुना गया है कि या तो बदल दिए गए थे या हटा दिए गए थे । 




















अब एक 'शोलेबाज़' होने के नाते मेरी दिलचस्पी इसमें काफ़ी समय से थी कि किसी प्रकार से संवादों में जो भी बदलाव हुए वो सब और मूल रूप से कव्वाली किस जगह रखी गयी थी ये सब जानने को मिल जाये जिसके चक्कर में काफ़ी खोज की गयी, पुरानी फ़िल्मी पत्रिकाओं को तलाशा गया कि शायद कहीं कुछ पढ़ने को मिल जाये, रमेश सिप्पी साहब और सलीम-जावेद साहब के तमाम साक्षात्कारों पर नज़रदानी की गयी, अनुपमा चोपड़ा की क़िताब से भी उम्मीद रखी गयी लेकिन कहीं कुछ जानकारी ख़ास नहीं मिली । 

ऐसे में अभी कुछ दिनों पहले जब उपन्यासों के एक बड़े लॉट को खरीदा गया तो उसमे 'शोले' के स्क्रीनप्ले का उपन्यास भी निकला जिसमे शोले का स्क्रीनप्ले संवादों सहित दिया गया था । साठ,सत्तर और अस्सी के दशक में जब फ़िल्मों की लोकप्रियता चरम पर थी तब हिट फ़िल्मों का स्क्रीनप्ले और संवाद किसी उपन्यास की सी शक़्ल में प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किये जाते थे जोकि पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय भी होते थे । 




















































यह उपन्यास जोकि 1976 में प्रकाशित हुआ था को जब पढ़ा गया तो इसमें काफ़ी चौंका देने वाली नई-नई जानकारियां मिलीं जिनमे मुख्य: थी उस क़व्वाली के बारे में जानकारी जिसके बारे में मैं सोच-सोच कर परेशान था कि वो फ़िल्म में किस स्थान पर फ़िल्माने के लिए लिखी गयी थी ।




 इसके अलावा उपन्यास में कई ऐसी घटनाएं हैं जो प्रदर्शित फ़िल्म में नहीं थीं मतलब जिन्हे मूल स्क्रिप्ट में तो लिखा गया होगा लेकिन या तो संपादित कर दिया गया होगा या फ़िर फ़िल्माने के समय बदल दिया गया होगा । उदाहरण के तौर पर ट्रेन में डाकुओं से मुक़ाबले का दृश्य जिसमे जय-वीरू की हथकड़ी खोलने से पहले ठाकुर के साथ उनके काफी सारे संवाद होते हैं और अंत में ठाकुर उनकी तरफ़ हथकड़ी की चाभी फेंकता है जबकि फ़िल्म में ठाकुर रिवाल्वर की गोली से उनकी हथकड़ी खोलता है । इसके अलावा 'यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' गीत के बाद जय-वीरू एक ढाबे पर खाना खाते हैं और तदुपरांत एक मेले में जाकर एक बिगड़ैल घोड़े को काबू में करने की शर्त भी जीतते हैं । इसी प्रकार कई दृश्यों में कई ऐसे संवाद भी थे जो फ़िल्म में देखने को नहीं मिले । नमूने के तौर पर उस उपन्यास के एक पन्ने की यह तस्वीर देखिये और पढ़िए । 






कुल मिलकर इस 145 पन्नों के स्क्रीनप्ले/संवाद वाले उपन्यास के द्वारा शोले की स्क्रिप्ट से जुडी ढेरों नई जानकारी जानने को मिली । यह उपन्यास जोकि अहमदाबाद के प्रकाशक द्वारा इंदौर से छपवाया गया था, और इसमें लेखक के तौर पर सलीम-जावेद का नाम दिया गया है जिससे मतलब तो यह निकलता है कि शायद सलीम-जावेद साहब ने ही इस उपन्यास के लिए शोले की मूल स्क्रिप्ट मुहैय्या कराई हो । हालाँकि इस बात कि अभी पुष्टि होना बाकी है लेकिन इतना तो तय ही लगता है कि ऊपर ज़िक्र की गयी घटनाएं और संवाद शोले की स्क्रिप्ट से ताल्लुक तो ज़रूर ही रखते होंगे क्योंकि इस प्रकार के स्क्रीनप्ले/संवादों वाले उपन्यासों में घढ़ी हुई या मनगढंत घटनाएं होने का उदाहरण कभी सामने तो नहीं आया है ।     





15 comments:

parag said...

एक और कहानी जो मैंने भी शोले के बारे में पढी है कि रमेश सिप्पी शोले के रिलीज़ में आ रही महादिक्कतों के कारण (सेंसर बोर्ड का मानना था कि हिंसा का अतिरेक है फिल्म में) इतने क्रोधित हो गये थे कि अपनी पिक्चर को ही शेल्रव करने और देश से पलायन की सोच रहे थे कि अमिताभ बच्चन की इंदिरा गाँधी से नजदीकियों ने इस पिक्चर को प्रदर्शित करा दिया।

Zaheer said...

Yeah,Parag bhai i also have read the same.

3d said...

Thanks for providing these fact zaheer bhai.

Ashish Yadav said...

Nice to hear from you after long time. Yes it's nice to get to know of these facts. I was very much attracted to them in childhood.

Please also share your comics download links in a list if possible. It's very time consuming to go through the blog on 2g to download comics. It's really bad that even after 13 years since I first took an internet connection of 56 Kbps even today in my city I can't get a broadband and still on 80kbps speed.

Silly Boy said...

It is good to see you after a long time on blogsphere. It is indeed a discovery about the greatest movie of bollywood. Sholey is now a legend and like every legend there are mysteries around it which the fans try to decode time and again. It would be great on your part if you can post covers of your lot as you used to do in the old good times!

PD said...

वाह.. लग रहा है जैसे जानकारियों का पिटारा है यह पोस्ट.
भाई, उस किताब को स्कैन कर के उपलब्ध करा सकते हैं क्या?

Zaheer said...

You are welcome 3D ji.

Zaheer said...

I will try for that Ashish Yadav Bhai.

Zaheer said...

SB its nice to see you here.Well,i was waiting for you to put up covers of your collection on your blog!
I will try to write a post on vintage novels as i have added up quite a few vintage novels in my collection in the meantime.

Zaheer said...

PD bhai that book is too rare to post publicly here on blog.

Mukesh said...
This comment has been removed by the author.
Mukesh said...

Kaafi badhiya post hai Zaheer bhai...
itni iconic film, jiska itna vishleshan ho chuka hai aur jo almost ham sabhi ki day-to-day life ka hissa ban ne waali shayad ekmatra picture hogi, uske baare mein aur kya hi kahaa jaa sakta hai. Fir bhi, jahaan tak sawaal hai, sholay mein 'extra' scenes hone ka, jo baad film mein nahi rakhe gaye, to abhi ek interview dekha Salim Javed sahab ka, jisme unhone bataaya ki siwaay ek scene ( Veeru ke Jai ko Mausi ke paas jaane ki manuhaar karne waali scene ) ke alaawa kahin bhi koi change nahi hua tha, aur ye water-tight script thi...ho sakta hai jo novel aapne padha hai, usme writer ne apne taraf se bhi kuchh daal diya ho....aapke liye us video ka link ye raha
https://www.youtube.com/watch?v=eYTHbkWqWaM

Iske alawaa, ek aur behatareen review jo Sholay 3D ki nazar mein
aayi, wo ye thi : http://baradwajrangan.wordpress.com/2014/01/17/lights-camera-conversation-back-on-the-big-screen/

Is post ki comments section bhi padhiyega, kaafi mazedaar hain

Is post ke liye dhanyavaad :D

Zaheer said...

मुकेश भाई कमेंट के शुक्रिया । 'शोले' में कई ऐसे दृश्य थे जो मूल स्क्रिप्ट में तो थे लेकिन फ़िल्माने के समय या उन्हें फ़िल्माया नहीं गया या फिर संपादन के समय हटा दिया गया । उदहारण के तौर पर वह कव्वाली जो स्क्रिप्ट में थी, रिकॉर्ड भी की गई लेकिन फिल्मायी नहीं गई और जिसके फ़िल्म में शामिल न हो सकने का आनंद बक्षी को आज भी मलाल है क्योंकि बकौल उनके अगर फ़िल्म में वह कव्वाली शामिल की गई होती तो उनका कैरियर बतौर गायक भी चल निकलता क्योंकि उस कव्वाली में उन्होंने भी अपनी आवाज़ दी थी । इसके अलावा गब्बर द्वारा सचिन को मारने का दृश्य भी मूल स्क्रिप्ट में था जो सेंसर की आपत्ति के बाद हटा दिया गया । एक ढाबे का दृश्य भी था जहाँ वीरू-जय खाना खाकर गरारे करते हैं, लेकिन फ़िल्म में वह दृश्य भी शामिल नहीं है ।
जिस किताब की मैंने इस पोस्ट में बात की है उसमे यह सारे दृश्य हैं प्लस इनके अलावा और भी कई दृश्य हैं या संवाद हैं जो फ़िल्म में नहीं हैं जोकि या तो शायद फिल्माए नहीं गए या फिर संपादन के वक़्त हटा दिए गए । इस प्रकार की किताबें जोकि फ़िल्म का स्क्रीनप्ले होती हैं उनमे एक-आध संवाद की गलती होने की संभावनाएं तो बनती है लेकिन पूरे का पूरा दृश्य गलत या अलग हो इसकी मुम्कीनियात ना के बराबर ही होती है, और वैसे भी चूँकि इस क़िताब का प्रकाशन फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद हुआ था तो ऐसी सूरत में क़िताब में सिर्फ वही दृश्य होना चाहिए थे जोकि प्रदर्शन के समय फ़िल्म में शामिल थे लेकिन ऐसा नहीं है और ऐसा न होना ही इस तथ्य को बल देता है कि सलीम-जावेद ने शायद इस प्रकाशन को 'शोले' की 'रफ़' या मुक़म्मल स्क्रिप्ट मुहैय्या करायी थी ।

Neha Gupta said...

Wow interesting blog with awesome content on old films and comics.. And I love the fact that you write in Hindi

But where do u get all these treasure of old books?

Zaheer said...

Thanks Neha.Well,these are the result of meticulous and dedicated searching.

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