Monday, May 24, 2010

# वाकुल दुर्ग का रहस्य

UPDATE(24th May):2nd part of 'Vakul Durg Ka Rehasya' also uploaded.
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दोस्तों प्रस्तुत है वेताल के सबसे ज़्यादा लोमहर्षक कथाओं में से एक "वाकुल दुर्ग का रहस्य" जो की इंद्रजाल कॉमिक्स द्वारा 1980 में प्रकाशित की गई थी.
इस कॉमिक की ख़ास बात ये है की या एकलौती ऐसी Swedish कहानी है जिसने इंद्रजाल कॉमिक्स के पन्नो में जगह पाई,और दूसरी बात,ये उन चंद कथाओं में से एक है जो ली-फाल्क की कलम से जन्म लेने के बावजूद रोमांच और स्तर में किसी भी दूसरी फाल्क वेताल-कथा से पीछे नहीं है.
ऐतिहासिक घटनाओ की पृष्ठभूमि में कहानी बुनने की फाल्क की ख़ासियत का लेखक 'नॉर्मन वर्कर' ने भी अनुसरण किया है और कार्पेटिया एवं ऑस्ट्रिया के बीच हुई जंग के कैनवस पर इस कहानी में रंग भरे हैं.

















कथा कुछ ऐसे शुरू होती है,ऑस्ट्रिया ने जबरन कार्पेटिया को कब्ज़ाये रखा है,बाद में बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना को कब्ज़े में लेने की लिए कार्पेटिया से सैनिक बुलाये जाते हैं,मौका देख कर स्थानीय अवाम पुराने शासक एवं वाकुल दुर्ग के मालिक काउंट स्टायरबाश के नेतृत्व में विद्रोह कर देती है जिसको कुचलने के लिए कार्पेटिया व ऑस्ट्रिया के मध्य युद्ध होता है.मैदान काउंट के हाथ आता है पर भीषण लड़ाई और काफी नुकसान के बाद,घायलों और कमज़ोर सैनिकों को लूटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुजरिम संगठन 'गिद्ध' नज़रें गड़ाए बैठा था पर इस बार गिद्ध के मंसूबे कुछ और ही थे,बुरी तरह थके सैनिकों और घायल काउंट की अवस्था का फायदा उठा कर गिद्ध का मुखिया ब्लैक बोरिस एक खुनी योजना को अंजाम देकर काउंट की जगह ले बैठता है.स्थानीय अवाम पर काउंट के ज़ुल्म हद पार कर जाते हैं,जनता त्राहि-त्राहि कर बैठती है.इस अत्याचारी से कैसे छुटकारा पाया जाये ये विचारने के लिए महापौर के घर बैठक होती है और उसमे ज़िक्र छिड़ता है वेताल का जिसने पूर्व में कभी स्टायरबाश परिवार के किसी सदस्य के मदद की थी एवं जिसका सुरक्षा चिन्ह वाकुल दुर्ग के दरवाज़े पर चिन्हित था,नतीजतन वेताल से मदद की गुहार लगायी जाती है,और जैसा की आशा थी वेताल(मौजूदा वेताल के दादा) का आगमन होता है और कैसे वो वाकुल दुर्ग को गिद्ध के आतंक से मुक्ति दिलाता है ये सब खुद ही जानिए इस सनसनीखेज चित्रकथा में.
वेताल-वृतांतों में से ली गई कथाएँ हमेशा सामान्य से अधिक रोमांचक एवं रोचक रही हैं इसी तथ्य को भुनाया है लेखक 'वर्कर' ने और इसमें सहयोग दिया है प्रतिभाशाली चित्रकार 'जैमे वाल्व' ने जिनके चित्र वेताल की शख्सियत को वही रहस्यमयी प्रभाव प्रदान करते हैं को कभी मूर के चित्र किया करते थे.
'गिद्ध' एक प्रभावशाली वेताल-खलनायक रहा है जो सर्वप्रथम नज़र आया था डेली स्ट्रिप न.114(The Vultures) में पर अचरज की बात ये है की फ़ाल्क ने कभी 'गिद्ध' को दोहराया नहीं,वैसे फ़ाल्क ने बहुत कम ही खलनायकों को दोहराया है और गिद्ध भी कोई अपवाद नहीं,पर स्वीडिश कथाकारों ने मशहूर खलनायकों का अच्छा इस्तेमाल किया है एवं कई रोचक कहानियां प्रस्तुत की हैं.
फ़ाल्क के उपजाऊ दिमाग में विचारों की कभी कोई कमी नहीं रही इसलिए उन्होंने पुराने खलनायकों को दोहराने की बजाये हमेशा नए-नए खलनायकों को पेश करने को ही तरजीह दी,हालाँकि कई ऐसे पुराने खलनायक रहे हैं जिनकी वापसी काफी धमाकेदार हो सकती थी पर फ़ाल्क का नज़रिया शायद दूसरा ही था.जिन खलनायक किरदारों को फ़ाल्क ने दोहराया है उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है जैसे की 'ताराकिमो,टेरर,कुला कु’.
अगर फ़ाल्क चाहते तो गिद्ध को भी उसी रोमांचक रूप पेश करते रहते जिस तरह अष्टांक को उन्होंने मैन्ड्रेक के सदाबहार खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया,अष्टांक और विषधर ही एकमात्र ऐसे खलनायक रहे जिनसे मैन्ड्रेक की मुठभेड़ कई बार दोहराई गयी और अंत में ये दोनों एक ही व्यक्ति निकले.अजीब बात है की मैन्ड्रेक के लिए उन्होंने खलनायकों को दोहराने से परहेज़ नहीं किया पर वेताल के लिए उनका नज़रिया कुछ अलग ही रहा.
खैर,बात करते है मौजूदा कॉमिक की,इस कहानी की खासियतों में कसी हुई स्क्रिप्ट,चुस्त संवाद और कमाल के चित्र शामिल है,खासतौर से दुसरे भाग का मुखपृष्ठ जो की निश्चय ही इंद्रजाल कॉमिक्स के सबसे आकर्षक कवर्स में से एक है.
ज़रा गौर फरमाइए इस कवर पर,फ्रंट में वेताल की गंभीर मुखमुद्रा वाला ब्लोअप,आगे गरजती हुई तोपें और पीछे आग की लपटों से बनती हुई अक्षर 'V' की शक्ल जिसमे गिद्ध उड़ रहे है..वाह,कमाल की सोच को चित्रों द्वारा जीवंत किया है आर्टिस्ट 'जैमे वाल्व' ने!




















प्रथम भाग के कवर को तो स्वर्गीय गोविन्द जी ने तैयार किया था पर द्वितीय भाग के कवर को मुझे नहीं लगता की किसी दूसरे आर्टिस्ट ने तैयार किया होगा बल्कि कॉमिक के सबसे आखिरी पैनल को ही कवर का रूप दे दिया गया है जो की बिलकुल उचित निर्णय था.




















FREW द्वारा इस कथानक को सामान्य 32 प्रष्ट के फॉर्मेट में प्रकाशित किया था पर इंद्रजाल ने इसे दो भागो में प्रकाशित किया था,हालाँकि FREW द्वारा किसी भी पैनल की कांट-छांट नहीं की गई थी पर उनके आकार में ज़रूर बदलाव किया गया था 32 पृष्ठ में कहानी को समेटने के लिए लेकिन इंद्रजाल ने पूरी भव्यता एवं सम्मानजनक तरीके से इस कहानी को दो शानदार भागों में पाठकों से सामने रखा.
दोस्तों,तुलनात्मक अध्धयन हेतु FREW द्वारा प्रकाशित इसी कहानी का वो अंक भी साथ-साथ प्रस्तुत किया जा रहा है हार्दिक साभार सहित जनाब अजय मिश्रा साहेब के जिन्होंने इस अंक को तुरत-फुरत स्कैन कर भेजने की कृपा की.





















33 comments:

Colonel Worobu said...

Even though I do not understand Hindi, I looked through this post and was rewarded by the Frew download hidden within. Thanks CW!

kuldeepjain said...

हे जहीर भाई
आप कहते हो कि " वाकुल दुर्ग का रहस्य" इंद्रजाल कॉमिक्स द्वारा 1981 में प्रकाशित की गई थी. मगर भाग १ को देखे तो दूसरा भाग १५ -१ १९८० को प्रकाशित हो रहा है. ये तो नहीं हो सकता ना ?
प्रकाशित विज्ञापनों को भी देखे तो पता लगता है कि ये कॉमिक्स १९८० में प्रकाशित हुआ है.. १९८१ में नहीं..

बाकी थोड़ी देर में..

chaltaphirtapret said...

COMIC BHAI : Indrajal Comic along with its original source Frew comic has really made this post totally class apart and unique one ! And what all you have written 'DIL SE' and shared with us about "vakul durg ka rahasya" is really worth to read again and again (as i have read it thrice so far!) Your deep rooted knowledge about comics is really really AMAZING ! How you came to know about every ins and outs of each and every major & minor detail of comics, really hard to understand. As you have written that it is first swedish story in IJC, not written by LEE FALK, about Norman verker, rally matchless and superb. Yes you are right that close up of vetaal in part 2 of vakul durg, face in 'V' shape flames, firing cannons and flying vulture all made its cover really 'breathtaking' ! I generally too impressed by cover of comic a lot (still remember cover of "SWARAN NAGRI" and "CHANDI KA PUTLA" posted by YOU only)
Last but not the least thanks to Mr. Ajay Mishra for making this post a special one by adding "FREW" to your post. SPECIAL THANKS TO BOTH OF YOU FOR PRESENTING A SPECTACULAR SUMMER BONANZA ! Eagerly awaiting Part 2 of "vakul durg ka rahasya"
Regards
VISHAL (pret)

Comic World said...

Col.Worobu: Welcome Col.,its nice to see you here after a long time.

Comic World said...

Kuldeep Jain: कुलदीप भाई,त्रुटी इंगित करने के धन्यवाद्,वो सिर्फ एक टायपिंग त्रुटी थी,जो की सुधार ली गई है.आपकी बाकि कमेन्ट का इंतज़ार रहेगा.

Comic World said...

CPP: Thanks Vishal for the kind words,your heartily comments provides the necessary encouragement for keep going.
2nd part has been also posted today only,pl check.

chaltaphirtapret said...

ज़हीर भाई :- कल जब मैंने "वकुल दुर्ग का रहस्य " का प्रथम भाग को डाउनलोड कर के पड़ा तो मन ही मन सोच रहा था की काश कॉमिक भाई दूसरा भाग भी साथ ही पोस्ट कर देते तो कितना मजा आता , आपने तो बिलकुल भी इन्तेजार नहीं करवाया और इस विध्वंसकारी कथा का समापन उसी दिन कर दिया. बहुत बहुत धन्यवाद (तनिक भी इन्तेजार न करवाने के लिए)
दुसरे भाग का सबसे विस्मयकारी दृश्य था वेताल का दो भैंसों सामान ताकतवर लोगों के साथ चाकुओं से भरी खाई के आर पार रस्साकशी का युद्ध !! वेताल ने कैसे आपने भाजुऊँ के दम पर उनको खींच के लटका दिया (यह देख कर मन ही मन बरबस ही वाह वाह निकल गयी ) यह कॉमिक सचमुच में ही वेताल के सबसे ज्यादा हेरातान्गेज एक्शन कॉमिक्स में से एक है
कॉमिक भाई, क्या आपके पास इंद्रजाल खंड संख्या ३८५, ३८६ (दोनों भाग केवल हिंदी में ) या फिर खंड संख्या ४०५ , ४०६ (तेरवां वेताल के दोनों भाग) हिंदी में उपलब्ध हैं तो आपसे विनर्म निवेदन है की कृपया इनको पोस्ट करने की भी कृपालता करें
आगे भी आपसे बहुल सी हिंदी इंद्रजाल पोस्ट का बेसब्री से इन्तेजार रहेगा
कृपया आगामी आकर्षण के बारे में भी बताएं
आपका अपना
विशाल (प्रेत)

Comic World said...

CPP: विशाल भाई ये कहानी है ही इतनी रोमांचक की जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा था तो स्तब्ध रह गया था और खासतौर से इसके चित्रों ने तो मन ही मोह लिया था,वैसा देखा जाये तो वेताल की समस्त कहानियां(ली फ़ाल्क रचित) इतनी रोचक और हृदयग्राही हैं की उन्हें बार-बार पढ़ने से भी जी नहीं भरता,मैं तो जब भी अवसर मिलता है तो इंद्रजाल का कोई भी अंक उठा लेता हूँ पढ़ने के लिए.
विशाल भाई मेरे पास अंक संख्या 300 से आगे की समस्त हिंदी इंद्रजाल कॉमिक्स संग्रहित हैं,आपके द्वारा वांछित अंक शीघ्र उपलब्ध कराने की कोशिश करूँगा.मुझे हर अंक के बारे में तफ़सील से बातचीत करते हुए कॉमिक पोस्ट करने में ज़्यादा मज़ा आता है और जब आप जैसे पाठकों की रोचक कमेंट्स मिलती हैं तो कॉमिक पोस्ट करने में लगी सारी मेहनत वसूल हो जाती है,पर दुर्भाग्यवश ज़्यादा पाठक तज़्किरा(डिस्कशन) करने में रूचि नहीं लेते हैं सिवाय आप,कुलदीप भाई,रफ़ीक भाई आदि जैसे चंद सुधी पाठकों को छोड़कर.
बहरहाल,आगामी आकर्षण के बारे में जल्द ही कॉमिक वर्ल्ड पर घोषणा की जाएगी बस आप-अपना प्यार कॉमिक वर्ल्ड के लिए यूँ ही बनाये रखिये.

Bengali Indrajal Comics said...

Thanks for Frew version of "The Secret of Vacul Castle" It really a nice story and which I like most is those strips drawing style, wonderful art of keith chatto.

Very nice idea to post same story with two different version.

Thanks again.

Comic World said...

BIC: Welcome on CW buddy.Yeah,cover art is by Keith Chatto,a hyped illustrator courtesy Jim Shepherd(Editor,Frew).
Chatto is better in cover art rather drawing full story as his work is too heavy as compared to other contemporary Phantom illustrators.

chaltaphirtapret said...

प्रिय ज़हीर भाई : यह पड़ के की आपके पास ३०० के आगे के सारे इंद्रजाल उपलब्ध हैं, मेरे मन का इंद्रजाल रूपी मयूर खुशी से झूमने लगा है और मस्तिषक में विचार हिरनों की तरह कुलांचे भरने लगे हैं की कॉमिक भाई की अगली हिंदी इंद्रजाल पोस्ट कौन सी होगी ? मेरा मन तो यह करता है की आपकी एक हिंदी इंद्रजाल पोस्ट पर ३ या ४ प्रतिकिर्यें तो व्यक्त कर ही दिया करुं क्योंकि आपसे वार्तालाप करते हुए एक अपनेपन का एहसास होता है I
अतत्य आपसे विनर्म निवेदन है की आप अपनी हिंदी इंद्रजाल पोस्ट को अपनी अति शुद्ध हिंदी के अपने वशिष्ट 'अंदाजे-खास-शैली' में ही अपने विचार तफसील से व्यक्त करें I मेरे विचार में इंग्लिश में चाहे जितना मर्जी प्रभावशाली तरीके से लिख लो, लेकिन विचार मन को नहीं छूते I मैंने आज तक जितने भी ब्लॉग देखे पड़े हैं , किसी को भी हिंदी में 'उस' अनुवाद शैली में नहीं देखा जितना की आपको ! आप अपने विचार बहुत ही ज्यादा दमदार तरीके से पेश करते हो और इन सबका असर मेरी अनुवाद शैली में भी आ गया है I यह भगवान् का दिया हुआ बहुत ही बेहतरीन तोहफा है, बस यूं ही लिखते रहिये " गोर फरमाएं कवर पर" !!!
आपका
विशाल (प्रेत)

Comic World said...

CPP: विशाल भाई,शुक्रिया,करम,मेहरबानी आपकी ज़र्रानवाज़ी और मौहब्बत में लिपटे अल्फ़ाज़ों का.ये आप जैसे दोस्तों की हौंसला-अफज़ाई ही है जो मुझे बेहतर से बेहतर पोस्ट तैयार करने की प्रेरणा देती है.
ठीक कहा आपने की अंग्रेजी में चाहे जितना भी घुमावदार तरीके से लिख लो पर शब्द दिल को नहीं छूते और छुएं भी क्यूँ आखिर विदेशी भाषा में कैसे कोई अपने भाव पूर्णतया व्यक्त कर सकता है!सच्चे भाव सिर्फ मातृभाषा में ही पूरी तरह से उभर कर सामने आ सकते हैं.
ये देख कर और भी अच्छा लगा की आपने अपने भाव हिंदी भाषा में व्यक्त करना आरम्भ कर दिया है,आशा है की अन्य मित्र भी आपका अनुसरण करते हुए आगे से हिंदी पोस्ट में हिंदी में ही अपने विचार प्रकट किया करेंगे.
अंत में इस असीम प्रशंसा के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद्.

Raju said...

"पर दुर्भाग्यवश ज़्यादा पाठक तज़्किरा(डिस्कशन) करने में रूचि नहीं लेते हैं सिवाय आप,कुलदीप भाई,रफ़ीक भाई आदि जैसे चंद सुधी पाठकों को छोड़कर."
You forget to mention my name-O! In fact I only one who visit your blog just for discussion as I am unable to download any comics.
Ab jab comics hi nahi hai to kya vichar pesh karon. Badi mushkil se kal sham ko hi pehla bhag ki hard copy mili hai wo bhi coverless.

Lalit oberoi said...

dear Zahir,

Thanks for these wonderfull posts. But today i am facing a bit problem in opening full posts. when i click on Dharamyug post, it failed to open full post. Can you please check weather this error occured on my side only or everyone else is facing this problem ?

One more thing. Can you please post the movie review and articles from old filmi magazines like Sushma and dharamyug (Just like Johny mera naam). That was awesome post. I request you to please upload more filmi posts.

Thanks
Lalit oberoi

Comic World said...

Raju: Arun Bhai(am i right to recognize you behind your new nick 'Raju'!)yeah,i forgot to mention your name as well as of few others but to accommodate the same i attached "etc" to the name list,anyway you are also among of those readers whose comments do encourage me to keep going.
Congrats for getting hard copy of any IJC in any condition as you must be aware of that how much difficult it has became to get hold of any of its hard copy.

Comic World said...

Lalit Oberoi: Welcome Lalit and thanks for pointing out the error in opening of the posts,that error has been fixed and now posts are opening quick,pl check at your end.
Well,i am waiting to see more of such readers to come up who did like such kind of posts,yeah,i can certainly post more of similar posts but for that i should know that there are readers who like these,so pl come quick and fast with any such kind of requests.

Lalit oberoi said...

Thanks Zahir brother for fixing error and yes its resolved now. Well i have posted similar request earlier too at your Sushma post. I always enjoy such stuffs, basically i am more interesting in old bollywood stuffs from magazines like reviews from old magazines and interesting articles and old movies informations. I can bet you will find much more followers(you already has awesome followers) once you started posting these stuffs too. Thanks zahir brother for such a wonderfull blog again. I really adore your efforts. god bless you.

lalit oberoi

Lalit oberoi said...

And one more thing, i equally enjoy reading stuffs related to comics, I am huge comics fan and i was used to read comics upto 1994-1995. MCK and raj comics was my favourite, but now i also found indrajal comics equally intersting just because of you. otherwise i never read these comics at that time. I have check your collections at one of your posts and its really a mouth watering stuff. Dil to karta hai ki apko kahun ki ek hi din mein sab post and upload kar do. But i also want to enjoy your blog through out life. Thanks again.
Lalit oberoi

Comic World said...

Lalit Oberoi: Thanks for quick response Lalit bro.Its nice to see readers like you advocating for old bollywood stuff from old magazines,i too love to go through old filmy magazines in search of any rare information which i can get through them.
Though i already use to put up such odd article in between the comic posts but now will be putting up more frequently such post.

Lalit oberoi said...

Thanks zaheer brother. I check your pics and collections of books at vijay kumar sappatti blog. Kuch log bina mile hi dil ko choo jate hain, aap unme se hi ek ho. I generally visit your blog every day atleast once to see any new update and comments. BTW i am from NCR and if you know any place from where i can collect old stuff like this please let me know. I will be happy if i ca contribute any thing to this blog. This will nto e any help, but i will satisfy my passion towards reading of old stuffs like this.
Take care
Lalit oberoi

Comic World said...

Lalit Oberoi: Heartiest thanks for kind and appreciative words Lalit bro.I can understand your feeling of passion for comics which urged you to contribute something towards this blog.
Nowdays it has became very difficult to find old issues of Indrajal comics but other old comics/magazines might still be available at 2nd hand book shops of your locality,just check the old book shops of your area and who knows you might bump onto these.

Comic World said...

contd...
If you can check the Sunday book market of Dariyaganj it will be quite helpful in getting these old stuffs.

PBC said...

Thanks CW! You are breaking records, 3 OWN IJC in one month. Wow! Glad to see you in mood.

Hoping you & Vishal will continue at least some more months this way. Some more will help. I made my mind to PROVE one VERY BIG HEART CONTRIBUTOR who says doing in name of good & for ALL (NOT ME), but has over expectation to me ONLY- IT'S NOT A BIG TASK AS HE PRETENDS. Not a Mr. Clean himself too.

It's one of my favorite IJC story. May be it had such deep impact, until now & always I'll oppose two CHEAPEST HUMAN TYPES at any cost:
1. Vultures who attack/cheat weak/simple persons
2. Who wear MASK and pretend to be another person.

kuldeepjain said...

ये तो याद नहीं कि मैंने वाकुल दुर्ग किस वर्ष में पढ़ा था पर ये जरुर याद है कि मेरी दोस्त 'गीता त्रिपाठी ' से लेकर मैंने यह कहानी पड़ी थी . उस समय इंद्रजाल पढ़कर 'विषधर ' 'अस्तांक ' जैसे नाम जो रोमांच पैदा करते थे , वेताल की आग उगलती हुई पिस्टल जो सनसनी पैदा करती थी वो रोमांच आज की अति उन्नंत तकनीक से बनी पिक्चर देख के भी नहीं आता .


जैसा कि जहीर भाई ने हमेशा की तरह काफी विशेषज्ञ नजरो से इस इंद्रजाल को प्रस्तुत किया है, मेरे लिए कुछ और जोड़ना तो मुमकिन नहीं पर एक बात जो मै समझ नहीं पाया की ऐसा क्यों हुआ की वक़्त के साथ सारी अच्छी बाते ख़तम क्यों हो गयी . कॉमिक्स में इंद्रजाल से लेकर मनोज तक हम गवां बैठे. मल्टीप्लेक्स तो आ गए पर न रफ़ी हैं और न किशोर और ना ही " it is so simple to be happy but so difficult to be simple " जैसे दिल को छु लेने वाले सवांद . कल मै कुछ नए प्रकाशित होने वाले राज कॉमिक्स को देख रहा था और तुरंत ये महसूस किया की आजकल कॉमिक्स नहीं प्रकाशित होते बल्कि उन्हें ग्राफिक्स नोवेल का दर्जा दिया जाता है. इनमे सब कुछ लीपा पोती होती है बस वो नहीं होता जो दिमाग में छप जाता है की ३० साल बाद भी याद रहे. पुराने कॉमिक्स के दीवाने इस बात की तसदीक करेंगे की जब भी हम वाकुल दुर्ग जैसे कॉमिक्स के रूबरू दोबारा होते है तो सोचते है काश पुराने दिन वापस आ जाये.

ये मल्टीप्लेक्स भी ले लो.. ये इन्टरनेट भी ले लो..
मुझसे ले लो मेरा mp3 प्लयेर ..ले लो मेरी कार..
लौटा दो मुझे मेरा वो कॉमिक्स का बंडल, दे दो अपनी साइकिल उधार..
नाप लू कच्ची सड़के नंगे पाव पर लाइब्रेरी तो जाना जरुर ही है यार.

अब ना लाइब्रेरी रही ना इंद्रजाल पर शुक्र है ऊपर वाले का कि आप जैसे दीवाने बैठे है जो इस महफ़िल को आबाद किये हुए है.. एक बार फिर मेरी तरफ से आप सबका धन्यवाद्.

Raju said...

ये मल्टीप्लेक्स भी ले लो.. ये इन्टरनेट भी ले लो..
मुझसे ले लो मेरा mp3 प्लयेर ..ले लो मेरी कार..
लौटा दो मुझे मेरा वो कॉमिक्स का बंडल, दे दो अपनी साइकिल उधार..
नाप लू कच्ची सड़के नंगे पाव पर लाइब्रेरी तो जाना जरुर ही है यार.
Though it looks funny on the face of it and beneath it lies a melancholy. Nowadays it is summer vacation time. Yesterday was holiday. The summer is at its peak in Delhi. A forced confinement at home. It reminded me my own summer vacation. I was allowed to rent three instead of two comics a day during summer vacations. Some comic publishers who used to publish comics monthly on 'set' basis usually a set of 4 or 8 comics used to published a bumper set during months of summer vacation i.e. May & June. Usually, 16 comics. Manoj and Diamond were pioneer in that. Some irregular comic publishers like Pawan Comics also used to bring out their sets regularly in this season. I used to cover a distance of about one k.m. to go to Delhi Public Library to have issued books from there:- DCs, Chitra Bharti, Dreamlands Publication, illustrated story books of Ruskin Bond and many more. At rental libraries apart from bumber sets that was time of browsing old stuff. Comics which were available throughout the year but I could not able to take on rent because of restrictions of only two comics a day and my eagerness to read new comics. Who cares for old when new were coming at a rapid pace. Sometimes I wonder why IJC not published comics on set basis and stick to its a comic per week policy or why it did not publish Betal or Bahadur comic every week as at that time I only used to read only Betal, Mandrake or Bahadur IJC and used to skip other IJCs. So I was never able to read any IJCs prior to 1985 on those years. So friends sorry no nostalgia of mine is associated with 'Mystery of Vacul Castle' or any IJC whatsoever published before 1985 but lot of nostalgia is associated with P/M/B comics of post 1985 years. But I read the Ist part last evening after getting a coverless copy of the same at a second-hand book stall and recently reading its review at your Zahir Bhai's blog recently. I found it quite interesting and near the style of story-telling of late Lee Falk but as I said reading this comic is an experience of a 31 year old mind and not that of a 8 to 15 year old mind and so I read it with some reasoning and despite that I enjoyed it and eager to read the IInd part and so according to my yardsticks it is a good comic. But I read it on reasoning basis not on emotional basis. Any story of Lee Falk and Sy Berry(not by any other artist as I grew up reading stories illustrated by Sy Barry published in DC and IJCs arouse bouts of nostalgia and emotions in me and I mentally returned to my childhood to enjoy my summer vacations again. I am not clear what I want to convey by this comment. I started it with the intention to compare mine summer vactions when I had the privelege of reading so many beautiful comics and books with that of my daughter who spends her vacactions not on comics (for her comics are avaliable as I have collected over 2000 comics, not for her but for me but still she can read the same) but on watching lifeless animations of numerous TV channels. Even the catoon films we used to see on those days on Doordarshan were much much better than these dul animated series. I try to encourage her to read books but in vain. Thankfully, I do not have a computer or internet at home. Does anybody remember Spiderman, Bunny, Gayab Aya which used to be shown on those days on T.V. This comment has become quite lenghty. Some more nostalgia about TV later.
Apka Purana Silly Boy.

kuldeepjain said...

http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/mumbaimerijaan/entry/%E0%A4%9C-%E0%A4%A6%E0%A4%97-%E0%A4%95-%E0%A4%AB%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9

Comic World said...

PBC: Thanks and Welcome Prabhat.

Comic World said...

Kuldeep Jain: कुलदीप भाई आपकी कमेन्ट का जवाब देने में हुई देरी की माफ़ी चाहूँगा,दरअस्ल मेरा कम्प्यूटर क्रैश हो गया था जो अब जाकर ठीक हो पाया है और दूसरी बात आपकी कमेंट्स का जवाब मुक़म्मल तवज्जो चाहता है जिसके लिए दिलो-दिमाग की सुकूनियत वाले लम्हों की तलाश करनी पड़ती है जवाब लिखने के लिए.
ठीक कहा आपने की आजकल की कॉमिक्स को ग्राफ़िक नोवेल्स का दर्जा दिया जाने लगा है शायद 'कॉमिक' नाम कुछ ज्यादा ही बचकाना लगता है आजकल के प्रकाशकों को,पर इस कथित 'नामकरण संस्कार' से भी कुछ फ़र्क पड़ने वाला नहीं है इन कॉमिक्स अथवा ग्राफ़िक नोवल्स की बिक्री पर जबतक गुणवत्ता सुधार हेतु गंभीर कदम नहीं उठाये जाते प्रकाशकों द्वारा.
हाल में ही राज कॉमिक्स के नए सेट के कुछ कॉमिक्स उपरी आवरण से आकर्षित होकर उठा लाया था पर जब कॉमिक पढ़ी तो ऐसा लगा की पैकिंग तो ज़ोरदार थी पर भीतर का असली माल तो गायब है.उपरी साज-सज्जा तो खूब आकर्षक है पर 'कहानी' बिलकुल ज़ीरो है,अब ऐसे में पाठक इन कॉमिक्स खरीदें भी तो कैसे!
पुराने प्रतिभावान लेखक/चित्रकार मरते जा रहे हैं या बुढ़ापे के कारण निष्क्रिय हो चुके हैं,नए चित्रकार/लेखक गिरते कॉमिक व्यवसाय में आने में रुचिकर नहीं हैं तो ऐसे में कॉमिक्स की गुणवत्ता पर फ़र्क पड़ना तो लाज़िम ही है.
जारी हैं....

Comic World said...

Kuldeep Jain: शेष भाग..
कुलदीप भाई आपने ज़िक्र किया इस संवाद का "its so simple to be happy but so difficult to be simple",सचमुच कितना गहरा एवं गूढ़ अर्थ छुपा हैं 'बावर्ची' फिल्म के इस संवाद में.सही कहा आपने कॉमिक्स में मनोज और इंद्रजाल सरीखी कॉमिक्स लुप्त हो गई और फिल्मों में 'बावर्ची,परिचय' जैसी फिल्में.
वैसे फिल्मकार नहीं रहे अब तो भला वैसी फिल्में कहा बनेंगी!और देखा जाये तो क्या वैसे दर्शक भी हैं अब जो इस तरह की फिल्मों को पसंद करते थे?अगर 'बावर्ची' आज के दौर में बनती तो कितने दर्शक राजेश खन्ना के निस्स्वार्थी किरदार को समझ पाते जो दुसरो को खुशियाँ बटोरवाने की खातिर अपना सब कुछ लुटा कर खानसामा बना घूम रहा था!मुझे तो शक है की हमारे आज के युवा दर्शक उस किरदार की गहरायी को समझ पाते.
दरअसल ये भावनात्मक एवं कलात्मक कंगाली का दौर है,इन्सान की इंसानी भावनाएं सूखती जा रही हैं और वो अधिकाधिक मशीन बनता जा रहा है ऐसी मशीन जिसमे संवेदनाओं और सहनशीलता के लिए कोई स्थान नहीं,तो ऐसे में उसे उसी प्रकार की फिल्में पसंद आने लगी है जिनमे भावनाओं के लिए कोई स्थान न हो.
ठीक यही हाल कॉमिक्स का भी है,सरल,सहज कहानियों के पाठक नहीं रहे,युवा पीढ़ी को तो सेक्स,रोमांस और हिंसा लिप्त 'ग्राफिक नोवेल्स' में ही अधिक रूचि रहने लगी है.बचपन में नाना-नानी,दादा-दादी से सुनी राजा-रानी की कहानियों के पढने वाले पाठक अब कहाँ रहे हैं,अब तो बचपन दादा-दादी की गोद से ज्यादा टी,वी.,कम्प्यूटर आदि के सामने गुज़रता है,अब तो स्कूल बैग्स से कॉमिक्स की बजाये कंडोम बरामद होने लगे हैं.
तो ऐसे माहौल में हम और आप कैसे आशा करें की वो बीते दिन दुबारा लौट सकते हैं!अब तो बस उन चमकीले दिनों की यादें ही शेष हैं और बाकी हैं उस दौर की अनमोल निशानियाँ,यह कॉमिक्स, जिनके बारे में हम गाहे-बेगाहे चर्चा करके उस दौर की यादों में डुबकी कर पवित्र हो जाते हैं.

kuldeepjain said...

सत्य वचन जहीर भाई .. अभी जब मै यह सब कह रहा हू तो लगता है की मै भी उन बुजुर्गो की कतार में आ गया हू जो पुराने दिनों को याद कर के खुश होते है और आज के समय में तेजी से हो रहे बदलाव पे बैठे बैठे लानते भेजते रहते है. " अरे हमारे ज़माने में ऐसा था, वैसा था' | मै सोचता हू मोबाइल की ज़माने में आज का बच्चा शायद ही कोई माने की वेताल नगाडो से सन्देश भिजवाया करता था और हम खुद भी जो नयी तकनीक में खुद को ढाल चुके है आज कि तारीख में शायद ही देखना पसंद करते कि अज्ञात कमांडर मोबाइल पे col वोरुबू को आदेश देता | परिवर्तन संसार का नियम है और उससे मुझे कोई ऐतराज नहीं और समय के साथ चलना समझदारी है , जरुरत है , पर सवाल यह उठता है कि क्या हर परिवर्तन अच्छे के लिए होता है क्या हर परिवर्तन पर खुद को बदलना जरुरी है ?
ईमेल आया हम पत्र लिखना भूल गए ? याहू, हाट मेल चैट आया हम बात करना भूल गए ? मदर डे , फादर डे , टीचर डे है मगर हम इनकी इज्ज़त करना भूल गए.. इतनी ज्यादा जानकारी इशारे पे उपलब्ध है कि हम पढ़ना और दिमाग में रखना जरुरी नहीं समझते. सब चीज़ कॉपी और पेस्ट बन के रह गयी है |
तकनीक ने सुविधा तो बढ़ा दी पर जीवन के असली रंग ख़तम होते जा रहे है.
मै आज भी इसी दुनिया में हू कि किताबो कि असली दुनिया i -pad जैसे आप्लिकेसन ख़तम नहीं कर सकते. अगर में पिछले ५ साल बिना टीवी के गुजार सकता हू तो शायद आगे के ५ साल और.कहने का मतलब ये है की अंधाधुन्द नए रंग में ढालना आपको सुकून नहीं दे सकता

बावर्ची फिल्म जो संवाद मैंने लिखा था वो दिमाग में यु ही नहीं आया.. मै वो पिक्चर देख रहा था और फिर याद कर रहा था की किसी नयी पिक्चर में ऐसा कोई संवाद जो आँखे गीली कर दे या मन को भीगा दे ? कोई साहेबान याद दिलाएगा.. ? चुनिन्दा पिक्चरओ को छोरकर मुझे याद नहीं की मैंने अरसे से कोई पिक्चर देखी| ये हाल तब है जब हर पिक्चर की DVD सस्ते में हर जगह दुसरे दिन उपलब्ध है.

बहरहाल कॉमिक्स कि दुनिया में वापस आते है..

पुराने कॉमिक्स और कहानिओ की बात क्या थी इस पर हम बहुत तबसरा कर चुके. आज भी 'बूढी काकी' ( प्रेमचंद) पढ़कर आँखे नम हो जाती है. पञ्च परमेश्वर जैसी कहानिया के किरदार जुम्मन और अलगू अभी भी याद है | पर एक लम्बे अरसे से ऐसा कुछ पढ़ा नहीं जो दिमाग में रहे और दिल को छु जाये. जब तक भारत में था हिंदी ही पढ़ा .. यहाँ सिडनी आकर पढने की आदत जारी रखने के लिए काफी कुछ पढ़ा और अब भी पढ़ रहा हू| टिनटिन, एस्ट्रिक्स , हेरी पोटर वगेरा बहुत कुछ, पर सच मानो दिमाग अभी भी हिंदी में अटका हुआ है. अभी मेरे एक दोस्त ने एक ईमेल फारवर्ड किया जिसमे पुरानी यादो को उकेरा गया था. जैसे दूरदर्शन, रामायण, मिले सुर , कच्ची धुप, चित्रहार और तुम्हारे ब्लॉग की तरह येही लगा की वो दिन कितने अच्छे थे.

यादे अब याद बन कर रह गयी है.उन यादो को याद ही करता हू.
जब मिलता कोई पड़ाव ऐसा उदासी भरी साँस ही ले सकता हू.

Comic World said...

SB: Yeah,summer vacations were used to be so joyful days not less than any sort of paradise as whole days we use to read comics,play carom-board,flying kites or cycling,mauja hi mauja pure din... but comics were the cherry of the cake,luckily there was not any limitation on no. of comics to be hired as we kids use to run our own library in summer vacations where we read the comics first before putting them on rental.
Yeah,Manoj and Diamond use to publish bumper sets in summer vacations and it was not less than any treat to read them,many of times i use to hire whole set and sometimes bring only selected comics.
Wow,you have collected lots of comics and i seriously wish to have a close look on them.Why don't you write something about your collection,incident you faced during collecting them along with snaps of your fabulous collection which i will be posting at Comic World.

Comic World said...

Kuldeep Jain: कुलदीप भाई जब हम बच्चे/नवयुवा थे और अपने बुजुर्गों को अपने ज़माने की बड़ाई करते सुनते थे तो सोचते थे की वे ऐसा क्यों कहते है,अब जाकर समझ आया है की ऐसा क्यों कहा जाता था.दरअसल,अगर इंसानी नज़रिए से देखा जाए तो ज़माना वक़्त के साथ बाद से बदतर होता जा रहा है,इंसानियत धीरे धीरे बीमार होकर मरती जा रही है.पाश्चात्य रंग-ढंग हम पर हावी होता जा रहा है और हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं.भौतिकतावाद हर रंग को अपने रंग में रंगता जा रहा है,भावनाएं,इंसानी लिहाज़,एक-दुसरे की बर्दाश्त,इंसानियत के लिए दर्द धीरे-धीरे बीते ज़माने की बाते बनती जा रही हैं.आजकल की इंसानी ज़रूरतें इतनी बढ़ गई हैं की पैसा भगवान् का रूप ले चूका है और सारी मारा-मारी इसकी वजह से ही है.पहले इन्सान को उसके इल्म से मापा जाता था अब उसकी माली हैसियत से.
कुछ दिनों पहले टी.वी. पर एक विज्ञापन आ रहा था जिसमे एक 6-7 वर्ष का बच्चा किसी कार शोरूम में एक कार बुक कराने पहुँचता है और कार सेल्समैन उसे 'Sir' कहकर संबोधित करता है....मुझे याद है बचपन में जब कभी मैं किसी दूकान में कुछ खरीदने जाता था तो दुकानदार हमेशा "बेटा क्या चाहिए?" जैसे शब्दों से ही स्वागत करता था पर अब तो ग्राहक सिर्फ ग्राहक यानि पैसे कमाने का ज़रिया मात्र ही रह गया है,छोटे-बड़े होने का कोई महत्व नहीं रह गया.बड़े-छोटे को संबोधन करने वाले 'काका,चाचा,ताऊ,बेटा' आदि जैसे शब्द शुद्ध भौतिकतावाद की आंधी में कब के खो चुके.
सही कहा आपने,तकनीक तो बढ़ चुकी है पर जीवन के रंग फीके हो गए है.ई-मेल ने खतों/चिट्ठियों को ख़त्म कर दिया,ढेरों नए-नए दिवस तो प्रचलन में आ गए है पर उनकी आत्मा नदारद है.शोक दिखने के लिए हम भी बाज़ू पर काली पट्टी बांधने लगे हैं पर चेहरा शोक से शून्य है,पश्चिमी रंग-ढंग में खुद को ढालकर हम आधुनिक होने का दिखावा करने लगे हैं बिना ये सोचे की क्या यही सच्ची आधुनिकता हैं,क्या अपने कल्चर को बासी एवं पुराना समझ कर छोड़ देना ही आधुनिकता हैं!
हर हिस्से में गिरावट आ चुकी है तो कॉमिक्स की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है,पुराने पुख्ता और पायेदार लेखक/कलाकार ख़त्म होते जा रहे हैं नए बेवकूफ और छिछले लोग उनकी जगह बने हुए हैं.'प्रेमचंद' की लेखनी इतनी सशक्त क्यों थी,क्योंकि उन्होंने संघर्षमय जीवन उसकी कठोर सच्चाइयों के बीच रहकर गुज़ारा था,है कोई आजकल का लेखक जिसने जीवन के संघर्ष को इतने करीब से देखा हो?कुंदन बनने के लिए सोने को आग में तपना पड़ता है.
बाकी बहुत कुछ है अभी सीने में कहने को,चलिए इस दिल के छाले और किसी दिन फोड़े जाएँगे!

Unknown said...

amazing work, keep it up, puraane din yaad aa gaye

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